मप्र की भाजपा सरकार ने राज्य को भारी कर्ज में डुबोया: माकपा

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मप्र की भाजपा सरकार ने राज्य को भारी कर्ज में डुबोया: माकपा

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  • Publish Date - April 2, 2026 / 10:16 PM IST,
    Updated On - April 2, 2026 / 10:16 PM IST

भोपाल, दो अप्रैल (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने बृहस्पतिवार को दावा किया कि मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने राज्य को भारी कर्ज में डुबा दिया है और इससे राजनेताओं, अधिकारियों और बिचौलियों को फायदा हुआ है जबकि इसका बोझ जनता को ही उठाना पड़ेगा।

माकपा की मध्यप्रदेश इकाई के सचिव जसविंदर सिंह ने एक बयान में कहा कि राज्य सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में प्रशासन चलाने के लिए रोजाना लगभग 250 करोड़ रुपये का कर्ज लिया, जिससे वर्ष में कुल उधारी 91,500 करोड़ रुपये हो गई। उन्होंने कहा, “राज्य का कुल बकाया कर्ज 5.56 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया है जबकि आबादी करीब नौ करोड़ है। राज्य विधानसभा में पेश आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इसका प्रति व्यक्ति ऋण लगभग 6.17 लाख रुपये है जबकि प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1.69 लाख रुपये ही है।”

सिंह ने कहा, “अगर नागरिकों की पूरी आय का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जाता है तो भी कर्ज चुकाने में चार साल लगेंगे। राज्य ऋण पर 12 प्रतिशत की अनुमानित दर से ब्याज के रूप में सालाना लगभग 66,720 करोड़ रुपये का भुगतान करता है। सरकार नए सिरे से उधार लेने की योजना बना रही है।”

उन्होंने सवाल किया कि क्या वास्तव में कर्ज का उपयोग लोक कल्याण के लिए किया जा रहा है?

सिंह ने आरोप लगाया कि किसानों को मंडियों में लाभकारी मूल्य नहीं मिलता जबकि श्रमिकों और कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है।

उन्होंने कहा कि आशा, उषा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने मानदेय में वृद्धि के लिए आंदोलन कर रही हैं।

सिंह ने कहा कि उधार ली गई धनराशि के माध्यम से बनाए गए बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता खराब है, पुल ढह जाते हैं और बारिश के बाद सड़कें खराब हो जाती हैं जबकि विद्यालयों में शिक्षकों, अस्पतालों में चिकित्सकों और सरकारी विभागों में रिक्तियां हैं।

बयान के मुताबिक, “प्रदेश पर कर्ज के बोझ का बड़ा हिस्सा भाजपा नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों और दलालों की तिजोरियों में जमा हो गया है। भविष्य में भी भाजपा प्रदेश को और अधिक कर्ज में धकेल रही है। अंततः प्रदेश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से इस कर्ज के बोझ को उतारा जाएगा।’

भाषा ब्रजेन्द्र जितेंद्र

जितेंद्र