इंदौर, 20 फरवरी (भाषा) मध्यप्रदेश में कर सलाहकारों के संगठनों ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय से मांग की है कि इस हिन्दी भाषी सूबे में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) से जुड़े मामलों में एक न्यायाधिकरण के सामने अपील दायर करने के लिए सभी दस्तावेजों को अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करके पेश किए जाने की अनिवार्यता समाप्त की जानी चाहिए।
संगठनों का कहना है कि इस ‘अव्यवहारिक बाध्यता’ से अपीलकर्ताओं पर अनावश्यक वित्तीय भार पड़ रहा है।
मध्यप्रदेश टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के एके लखोटिया ने शुक्रवार को बताया कि उनके संगठन और राज्य की कमर्शियल टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इस विषय में ज्ञापन भेजा है।
उन्होंने बताया कि जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण के नियम 23 में प्रावधान है कि इस न्यायाधिकरण के सामने कोई अपील अंग्रेजी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में दायर की जानी है, तो सभी दस्तावेजों के साथ उनकी अंग्रेजी में अनुवादित प्रतियां प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है।
लखोटिया ने कहा,‘‘राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार मध्यप्रदेश को ‘क क्षेत्र’ में रखा गया है जहां मुख्य रूप से हिन्दी का उपयोग आवश्यक है। राज्य जीएसटी विभाग के अधिकांश आदेश और दस्तावेज हिन्दी में जारी होते हैं। ऐसे में अपील के स्तर पर हर दस्तावेज का अनिवार्य रूप से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किए जाने का प्रावधान अव्यवहारिक है जो अपीलकर्ताओं पर अनावश्यक वित्तीय भार डाल रहा है।’’
उन्होंने बताया कि कर सलाहकारों के संगठनों के ज्ञापन में देश के संविधान के अनुच्छेद 348 का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों तक ही सीमित है, जबकि जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण एक वैधानिक अधिकरण है जिस पर यह बाध्यता सीधे लागू नहीं होती है।
लखोटिया ने कहा कि ज्ञापन में केंद्र सरकार से मांग की गई है कि हिन्दी भाषी राज्यों में जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण की पीठों को हिन्दी में भी अपील, कर-निर्धारण आदेश, प्रथम अपीलीय आदेश और अन्य संबंधित दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति दी जाए ताकि करदाताओं को सरल, सुलभ और समान न्याय मिल सके।
उन्होंने कहा,‘‘अगर हमारी मांग मानी जाती है, तो यह पहल भाषा आधारित बाधाओं को दूर करके न्याय प्रणाली को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।’’
भाषा हर्ष मनीषा रंजन
रंजन