Krishi Pathshala Kya Hai: ‘ये है अनोखी पाठशाला…खेतों में लगती है क्लास…शिक्षा देने खुद चलकर आते हैं टीचर’ प्रशासन की पहल जानकर आप भी कहेंगे, भई वाह…क्या बात है

Ads

Krishi Pathshala Kya Hai: 'ये है अनोखी पाठशाला...खेतों में लगती है क्लास...शिक्षा देने खुद चलकर आते हैं टीचर' प्रशासन की पहल जानकर आप भी कहेंगे, भई वाह...क्या बात है

  •  
  • Publish Date - April 16, 2026 / 09:52 AM IST,
    Updated On - April 16, 2026 / 09:52 AM IST

Krishi Pathshala Kya Hai: 'ये है अनोखी पाठशाला...खेतों में लगती है क्लास...शिक्षा देने खुद चलकर आते हैं टीचर' प्रशासन की पहल जानकर आप भी कहेंगे, भई वाह...क्या बात है / Image: MP DPR

HIGHLIGHTS
  • महिलाएं बनीं ‘कृषि गुरु’
  • प्राकृतिक खेती और किचन गार्डन को बढ़ावा
  • आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम

इंदौर: Krishi Pathshala Kya Hai जहां आमतौर पर पाठशाला का मतलब स्कूल, छात्र और शिक्षक से होता है, वहीं प्रदेश के इंदौर जिले में एक अनोखी पहल देखने को मिल रही है। यहां “कृषि सखियों की पाठशाला” में न तो पारंपरिक शिक्षक हैं और न ही छात्र-बल्कि किसान दीदियां ही शिक्षक बनकर किसानों को खेती के नए तरीके सिखा रही हैं। इंदौर जिले के महू जनपद में संचालित इस अनूठी पहल के तहत स्व-सहायता समूह की महिलाएं किसानों को प्राकृतिक खेती, किचन गार्डन और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दे रही हैं।

खेतों में लग रही ‘कृषि पाठशाला’

Krishi Pathshala Kya Hai कृषि सखी एवं संध्या सेल्फ हेल्प ग्रुप की अध्यक्ष पवित्रा निनामा ने बताया कि उन्होंने पांच गांवों में 100 से अधिक किसान परिवारों को किचन गार्डन विकसित करने के लिए प्रेरित किया है। इससे न केवल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिला है, बल्कि किसानों को आर्थिक बचत के साथ बेहतर स्वास्थ्य का लाभ भी मिल रहा है। किसान अब अपने घरों में उगाई गई सब्जियों का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने किसानों को जीवामृत, बीजामृत और अन्य जैविक घोल तैयार करना भी सिखाया है, साथ ही 125 से अधिक खेतों की मिट्टी जांच (सॉइल टेस्टिंग) कराई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस पहल का असर साफ नजर आने लगा है। कोलानी गांव की स्व- सहायता समूह सदस्य प्रमिला वसुनिया ने बताया कि किचन गार्डन से खेती में सुधार हुआ है और अब वे घर पर ही सब्जियां उगा रही हैं।

आर्थिक सशक्तिकरण की ओर बढ़ते कदम

यह पहल केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। स्व- सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अब अनाज उपार्जन और विपणन कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जिला प्रबंधक (मॉनिटरिंग-कृषि) गायत्री राठौड़ के अनुसार, जिले में 34 प्रोड्यूसर कंपनियों के माध्यम से महिलाएं गेहूं, मूंग और आलू जैसे उत्पादों के उपार्जन और विपणन से जुड़ी हैं। देपालपुर और महू ब्लॉकों में महिलाएं समूह के माध्यम से कृषि उत्पादों की खरीदी कर उन्हें मंडी तक पहुंचा रही हैं।

नवाचार बना सफलता की मिसाल

डे-एसआरएलएम इंदौर के जिला परियोजना प्रबंधक हिमांशु शुक्ला ने बताया कि “कृषि पाठशाला” का यह नवाचार सफल रहा है। अब तक 50 से अधिक गांवों में 100 से ज्यादा कृषि पाठशालाएं संचालित की जा चुकी हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।

प्रशासन का समर्थन

इंदौर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सिद्धार्थ जैन ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि कृषि सखियों द्वारा संचालित इन पाठशालाओं से किसानों को निःशुल्क और व्यवहारिक जानकारी मिल रही है। इससे उन्हें खेती की सही तकनीक समझने का अवसर मिल रहा है और प्रशासन लगातार किसानों को इससे जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

ये भी पढ़ें

‘कृषि सखियों की पाठशाला’ क्या है?

यह एक अनोखी पहल है, जिसमें ग्रामीण महिलाएं खुद किसानों को खेती के आधुनिक और प्राकृतिक तरीके सिखाती हैं।

इस योजना से किसानों को क्या लाभ मिल रहा है?

किसानों को किचन गार्डन, जैविक खेती और सॉइल टेस्टिंग जैसी तकनीकों की जानकारी मिल रही है, जिससे लागत कम और उत्पादन बेहतर हो रहा है।

किचन गार्डन से क्या फायदा हुआ?

किसान अपने घर में ही सब्जियां उगा रहे हैं, जिससे खर्च कम हुआ और परिवार को ताजी व पौष्टिक सब्जियां मिल रही हैं।

क्या इस पहल से महिलाओं को भी लाभ हुआ है?

हाँ, महिलाएं अब आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं और कृषि उत्पादों के उपार्जन व विपणन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

यह पहल किन क्षेत्रों में चल रही है?

यह पहल इंदौर जिले के महू और देपालपुर ब्लॉक सहित 50 से अधिक गांवों में संचालित की जा रही है।