इंदौर, 26 फरवरी (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर के एक निरूद्ध केंद्र में रखी गई एक बांग्लादेशी महिला को रिहा करने का आदेश देने से इनकार कर दिया है।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि निचली अदालत में विदेशी नागरिक के खिलाफ आपराधिक मामला विचाराधीन है और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को देखते हुए उसकी सुरक्षा के लिए उसे इस केंद्र में रखा जाना आवश्यक है।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगल पीठ ने बांग्लादेशी महिला की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का 23 फरवरी को निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह याचिका दायर की थी।
उसने याचिका में दलील दी थी थी कि उसकी जमानत याचिका पहले ही मंजूर की जा चुकी है, इसलिए उसे हिरासत केंद्र से रिहा किया जाना चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को लोगों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के मामलों में अलग-अलग रिट (औपचारिक आदेश) जारी करने की शक्ति देता है।
बांग्लादेशी महिला और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, विदेशियों विषयक अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के संबद्ध प्रावधानों के तहत इंदौर में 2020 के दौरान मामला दर्ज किया गया था। यह मामला वैध दस्तावेजों के बिना भारत में रहने, अपहरण एवं बंधक बनाने, मारपीट करने, फिरौती मांगने और धमकी देने के आरोपों में दर्ज किया गया था।
राज्य सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में दलील दी गई कि बांग्लादेशी महिला के खिलाफ गंभीर आरोपों में दर्ज मामले की सुनवाई खत्म नहीं हुई है, इसलिए उसे विदेशियों विषयक अधिनियम और अन्य प्रावधानों के तहत इंदौर के जिला जेल में बनाए गए एक निरूद्ध केंद्र में अस्थायी तौर पर रखा गया है।
युगल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर के बाद कहा,‘‘यह निर्विवाद तथ्य है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा अभी लंबित है और सुनवाई के दौरान उसकी उपस्थिति किसी भी समय आवश्यक हो सकती है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को देखते हुए उसकी सुरक्षा के लिए उसे निरूद्ध केंद्र में रखा जाना आवश्यक है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि वह बांग्लादेशी महिला की रिहाई की गुहार स्वीकार करने को इच्छुक नहीं है क्योंकि उसे जेल में नहीं, बल्कि निरूद्ध केंद्र में रखा गया है।
उच्च न्यायालय ने हालांकि इस तथ्य को रेखांकित किया कि विदेशी नागरिक के खिलाफ छह वर्षों से अधिक समय से मुकदमा लंबित है।
युगल पीठ ने कहा कि राज्य सरकार के वकील उसके आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से छह महीने के भीतर अभियोजन विभाग को निर्देश देंगे कि निचली अदालत में लंबित मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने के लिए गवाहों को पेश करने जैसे कदम उठाए जाएं।
युगल पीठ ने कहा,‘‘अगर इस अवधि के भीतर मुकदमे में कोई प्रगति नहीं होती है, तो याचिकाकर्ता इसकी सुनवाई में तेजी लाने के लिए एक नयी याचिका दायर कर सकेगी।’’
भाषा हर्ष
राजकुमार
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