पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों का आज भी उतना ही महत्व, जितना 1947 में था : राजनाथ

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पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों का आज भी उतना ही महत्व, जितना 1947 में था : राजनाथ

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  • Publish Date - June 19, 2026 / 08:05 PM IST,
    Updated On - June 19, 2026 / 08:05 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

नागपुर, 19 जून (भाषा) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को कहा कि पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों का आज भी उतना ही महत्व है, जितना 1947 में था। उन्होंने कहा कि इसलिये एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक आधार का महत्व भविष्य में भी रहेगा।

रक्षामंत्री ने कहा कि युद्ध के दौरान जब आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है, तो हर देश चाहता है कि ज़रूरी चीज़ों का उत्पादन देश के भीतर ही हो। उन्होंने कहा कि जो देश अपनी ज़रूरतें खुद पूरी करने में सक्षम होता है, वह पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है।

नागपुर के अंबाझरी में स्थित यंत्र इंडिया लिमिटेड (वाईआईएल) की आयुध फैक्टरी में 10,000-टन एल्युमीनियम एक्सट्रूज़न प्रेस (एईपी) के भूमि पूजन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने अब अगले कुछ वर्षों में तीन लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है।

सिंह ने कहा,‘‘पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों का महत्‍व आज भी उतना ही है, जितना 1947 में था और 2047 तक भी ये काफी हद तक बना रहेगा।। हम अक्सर कहते हैं कि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है। सीमाएं धुंधली हो रही हैं। दुश्मनों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। सेनाएं अपनी जगह पर खड़ी रह सकती हैं और देश अस्थिर हो सकते हैं। इनमें से बहुत कुछ सच है, लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने 1947 में थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ वर्ष 2047 में भी उनकी अहमियत लगभग वैसी ही रहेगी, जैसी आज है। हमें इस सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा। एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक आधार का महत्व लंबे समय तक बना रहेगा। मैं यह कहना चाहता हूं कि इसका महत्व अतीत में भी था, अब भी है और भविष्य में भी बना रहेगा।’’

सिंह ने कहा कि आज ‘एल्युमीनियम एक्सट्रूज़न प्रेस’ का भूमि पूजन देश की बदलती सोच को दर्शाता है।

रक्षामंत्री ने कहा कि जिन चीज़ों के लिए भारत को कभी दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, वे अब देश में ही बन रही हैं और उन्हें देश के लोग ही बना रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ मेरा मानना ​​है कि यह ज़रूरी है, क्योंकि हम सभी आज दुनिया के हालात साफ तौर पर देख सकते हैं। जब युद्ध हो रहा होता है, तो पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। ऐसे समय में, यह स्वाभाविक है कि हर देश यह चाहेगा कि उसकी सुरक्षा से जुड़ी ज़रूरी चीज़ें उसके अपने नियंत्रण में रहें और उनका उत्पादन उसके अपने लोग ही करें।’’

उन्होंने कहा कि जो देश अपनी जरूरतें खुद पूरी कर सकता है, वह पूरे भरोसे और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दृष्टिकोण इसी सोच पर आधारित है।

सिंह ने कहा कि भारत का रक्षा उत्पादन 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1,78,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा हो गया है, जो 2014 में महज 46,000 करोड़ रुपये था।

उन्होंने कहा कि 2014 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 1,000 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये हो गया है। उन्होंने कहा कि यह केवल आंकड़ों में वृद्धि नहीं है, बल्कि भारत के कौशल और आत्मविश्वास की क्षमता भी प्रदर्शित करती है।

मंत्री ने कहा, ‘‘हमने अगले दो से तीन वर्षों में तीन लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात का लक्ष्य रखा है और इसे तय समय-सीमा से पहले ही हासिल कर लिया जाएगा।’’

सिंह ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में वाईआईएल के अहम योगदान की तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि बदलते समय और नयी प्रौद्योगिकी को देखते हुए प्रणाली को मज़बूत और ज़्यादा चुस्त बनाने के लिए आयुध फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) का निगमीकरण किया गया था, और वाईआईएल उसी बदलाव का नतीजा है।

रक्षामंत्री ने कहस, ‘‘निगमीकरण के बाद, हमने यह परिकल्पना की थी कि नयी संस्थाओं को कामकाज में पर्याप्त आज़ादी मिलेगी और उन्हें नवोन्मेष, जोखिम उठाने, अनुसंधान और निर्यात के क्षेत्र में बेहतर करने के अवसर मिलेंगे।’’

सिंह ने कहा कि सभी नए रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (डीपीएसयू) ने इस दिशा में सफलतापूर्वक कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि ओएफबी का उत्पादन निगमीकरण के पहले साल यानी वित्तवर्ष 2019-20 में 12,755 करोड़ रुपये था, जो वित्तवर्ष 2025-26 में बढ़कर 26,282 करोड़ रुपये हो गया है। रक्षा उत्पादों का निर्यात निगमीकरण से पहले महज 81 करोड़ रुपये का था, जो बढ़कर 4,561 करोड़ रुपये हो गया है और इसमें वाईआईएल का योगदान 397 करोड़ रुपये है।

रक्षामंत्री ने कहा कि आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में किसी औद्योगिक इकाई को आगे बढ़ाने के लिए अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी)और पूंजी निवेश अहम हैं। उन्होंने कहा, ‘‘लंबे समय तक तरक्की करने और मुकाबला करने के लिए किसी भी संस्था के लिए ‘आर एंड डी’ बहुत ज़रूरी है। जो संस्थाएं नवोन्मेष को अपनाती हैं, वे ही भविष्य में आगे रहती हैं।’’

उन्होंने कहा,‘‘आधुनिक मशीनों के ज़रिए नयी प्रौद्योगिकी विनिर्माण प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जिससे उत्पादन प्रक्रिया में दक्षता बढ़ती है, गुणवत्ता बेहतर होती है और प्रक्रिया ज़्यादा आधुनिक व कुशल बनती है।’’

कार्यक्रम में मौजूद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, ‘‘दुनिया भारत के रक्षा क्षेत्र में विकास को पहचान रही है, क्योंकि केंद्र सरकार की कोशिशों से देश अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक निर्यातक के तौर पर अपनी जगह बना रहा है।’’

‘ऑपरेशन सिंदूर’ को ‘न्यू इंडिया’ की तकनीकी ताकत और अनोखी क्षमताओं का एक शानदार उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा कि डीपीएसयू और निजी क्षेत्र के बीच बढ़ता सहयोग देश को नयी ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।

भाषा धीरज दिलीप

दिलीप