भारत का विश्वगुरु बनना तय, देश के भविष्य पर संदेह न करें : मोहन भगवत

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भारत का विश्वगुरु बनना तय, देश के भविष्य पर संदेह न करें : मोहन भगवत

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  • Publish Date - April 24, 2026 / 10:06 PM IST,
    Updated On - April 24, 2026 / 10:06 PM IST

(तस्वीर के साथ)

नागपुर, 24 अप्रैल (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत निश्चित रूप से विश्वगुरु बनेगा और देश के भविष्य के बारे में किसी को भी कोई संदेह नहीं रखना चाहिए।

भागवत ने कहा, “पहले लोगों को संदेह था कि राम मंदिर कभी बनेगा भी या नहीं, लेकिन उसका निर्माण हुआ। इसी तरह, भारत का विश्वगुरु बनना भी तय है।”

आरएसएस प्रमुख यहां भारत दुर्गा मंदिर की आधारशिला रखने के बाद बोल रहे थे।

भागवत ने कहा कि भारत के विश्वगुरु बनने का सपना निरंतर प्रयासों और सामूहिक अनुशासन के माध्यम से साकार होगा। उन्होंने भरोसा जताया कि इस तरह का परिवर्तन वर्तमान पीढ़ी में देखा जा सकता है।

संघ प्रमुख ने कहा कि भारत के भविष्य को लेकर किसी भी तरह का संदेह मन से निकाल देना चाहिए।

उन्होंने कहा, “भारत के भविष्य पर संदेह न करें। साहस और आत्मनिर्भरता के साथ जिएं तथा इन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में अपनाएं। भारत मजबूत बनेगा और दुनिया का मार्गदर्शन करेगा।”

भागवत ने राम मंदिर आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा, “इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि कोई चीज होगी या नहीं होगी। जो होना तय है, वह होकर रहेगा।”

उन्होंने कहा, “यदि हम अपने संकल्प के अनुसार कदम दर कदम कार्य करते रहें, तो भारत मजबूत, सदाचारी और वैश्विक मार्गदर्शक बनेगा।”

भागवत ने कहा कि भारत को सही मायने में समझने के लिए लोगों को पहले भारत में गहराई से झांकना होगा।

उन्होंने कहा, “भारत माता की पूजा करने के लिए हमें खुद भारत बनना होगा।”

भागवत ने कहा कि देश को उसके सभ्यतागत मूल्यों के आधार पर समझा जाना चाहिए, न कि 150 वर्षों में विकसित औपनिवेशिक या पश्चिमी दृष्टिकोण से।

उन्होंने नागरिकों से “पश्चिमी सोच को त्यागने” और विचार एवं आचरण के मामले में भारतीय परंपराओं से फिर से जुड़ने का आग्रह किया।

भागवत ने कहा कि यह परिवर्तन दैनिक जीवन में छोटे, लेकिन सार्थक बदलावों से शुरू होगा, जैसे कि भाषा, पहनावा, खान-पान की आदतें और सांस्कृतिक प्रथाएं।

उन्होंने कहा कि भारत माता की पूजा का विचार केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए व्यक्तियों को अपने जीवन में स्वयं को भारत के स्वरूप में ढालने की आवश्यकता होती है।

भाषा पारुल अविनाश

अविनाश