पुणे, 24 सितंबर (भाषा) महाराष्ट्र में पुणे के भारती विद्यापीठ पुलिस थाने से संबद्ध 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिरासत में मारपीट करने, अवैध रूप से हिरासत में रखने और हत्या के मामले में आरोपी नाबालिगों समेत कई लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप में दो प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं।
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग (एमएसएचआरसी) के निर्देशों पर बृहस्पतिवार को यह प्राथमिकियां दर्ज की गई।
यह मामले महाराष्ट्र अपराध जांच विभाग (सीआईडी) के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) संकेत सतीश गोसावी की शिकायतों पर दर्ज किए गए हैं। यह कार्रवाई एमएसएचआरसी के नौ सितंबर के फैसले और उसके बाद राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) द्वारा दिए गए निर्देशों के तहत हुई है।
मानवाधिकार आयोग ने नौ सितंबर को कथित तौर पर हिरासत में प्रताड़ित करने, अवैध रूप से हिरासत में रखने और 21 जुलाई को कानून का उल्लंघन करने वाले नाबालिगों को पुलिस वाहन के बोनट से बांधकर उनका सार्वजनिक जुलूस निकालने के मामले में पुणे पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की थी।
इस घटना के दौरान तीन नाबालिगों को रस्सियों से पुलिस गाड़ी के बोनट से बांधा गया था और आंबेगांव पठार पुलिस चौकी से भारती विद्यापीठ पुलिस थाने की ओर सड़क पर उनका जुलूस निकाला गया। इन नाबालिगों को भारती विद्यापीठ पुलिस थाने में दर्ज हत्या के एक मामले के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था।
शिकायत के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिसकर्मियों ने बच्चों पर बांस के डंडों और लाठियों से हमला किया। वहीं वरिष्ठ निरीक्षक मानसिंह पाटिल और अन्य पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर बच्चों की पहचान हत्या के मामले में आरोपी या हत्यारे के रूप में की। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस सार्वजनिक अपमान के दौरान मृतक की मां ने बच्चों में से एक पर हमला करने की कोशिश भी की थी।
प्राथमिकी से पहले तैयार की गई एमएसएचआरसी की तथ्य-अन्वेषण रिपोर्ट में दर्ज किया गया था कि गाड़ी के बोनट पर जुलूस निकालने की बात की पुष्टि मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से हुई है। आयोग ने इस घटना के वीडियो सामने आने और उनके व्यापक रूप से प्रसारित होने के बाद स्वतः संज्ञान लिया था।
दूसरी प्राथमिकी 20 से 24 जुलाई के बीच कानून का उल्लंघन करने वाले आठ बच्चों को अवैध रूप से हिरासत में रखने और उनके साथ मारपीट करने के आरोपों से संबंधित है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बच्चों को निर्धारित अवधि से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया और उन्हें 25 जुलाई को ही किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया।
प्राथमिकी में कहा गया है कि हिरासत में रहते हुए बच्चों पर बांस के डंडों और लाठियों से हमला किया गया था। हालांकि पुलिसकर्मियों ने दस्तावेज तैयार कर यह दिखाया कि उनमें से कुछ को माता-पिता या रिश्तेदारों को सौंप दिया गया था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज और आयोग के समक्ष दिए गए बयानों से संकेत मिला कि वे पुलिस हिरासत में ही थे।
इनमें से चार बच्चों को बोनट जुलूस के दौरान सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और उनसे मारपीट की गई। शिकायत में कहा गया है कि चार बच्चे अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय के थे, जिसके कारण मामले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं।
एक अन्य प्राथमिकी भारती विद्यापीठ पुलिस थाने से संबंधित मामले में गिरफ्तार चार वयस्कों से जुड़ी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि हालांकि चारों ने पांच जुलाई को दोपहर लगभग तीन बजे पुलिस थाने में आत्मसमर्पण कर दिया था, लेकिन उनकी गिरफ्तारी औपचारिक रूप से रात 10.30 बजे दर्ज की गई।
इन चारों को पुलिस हिरासत में डंडों और लाठियों से पीटा गया और बाद में सात जुलाई को लेक टाउन के पास एक एसआरए (झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण) कॉलोनी में ले जाया गया, जहां कथित तौर पर उन्हें घुटनों के बल बिठाया गया, पीटा गया और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया।
शिकायत में कहा गया है कि हिरासत में लिए गए चार लोगों को एसआरए कॉलोनी ले जाने के संबंध में पुलिस थाने की जनरल डायरी या वाहन लॉगबुक में कोई प्रविष्टि दर्ज नहीं है।
इन दोनों प्राथमिकियों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम और बच्चों से संबंधित मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधान शामिल किए गए हैं।
भाषा सुमित नरेश
नरेश