मुंबई, 28 जून (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने कम हाजिरी की वजह से परीक्षा में बैठने से रोके जाने के विश्वविद्यालय के फैसले को चुनौती देने वाली एक विधि छात्रा को ‘‘लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना’’ बयान देने के लिए फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि न्याय का मतलब यह नहीं है कि ‘‘मैं जो चाहूं और जैसे चाहूं, वैसा हो’’।
न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति अजित कदेथंकर की औरंगाबाद पीठ ने 23-वर्षीय एक युवती की याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि झूठे दावों के जरिये अपनी गलतियों को छिपाने की उसकी कोशिश ‘‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’’ है, जिससे कानूनी पेशे में उसका करियर खतरे में पड़ सकता है।
अदालत ने 18 जून के अपने फैसले में कहा कि अदालतों में उठाए जाने वाले किसी भी मामले का मकसद नेक नीयत वाला होना चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘अदालत में हर कार्यवाही न्याय पाने के लिए होती है; लेकिन न्याय का मतलब यह नहीं है कि ‘जो मैं चाहूं और जिस तरह से मैं कहूं, वही हो’।’’
छत्रपति संभाजीनगर स्थित महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की एक परास्नातक छात्रा (याचिकाकर्ता) ने विश्वविद्यालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें अनिवार्य 75 प्रतिशत हाजिरी की शर्त पूरी न कर पाने के कारण उन्हें अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था।
अप्रैल में एकल पीठ द्वारा छात्रा की शुरुआती अर्जी खारिज करने के बाद, उसने एक पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें विश्वविद्यालय को विशेष रूप से परीक्षा आयोजित कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में दावा किया था कि उसकी हाजिरी की गणना करने में गलती हुई थी और आरोप लगाया कि कॉलेज ने कुछ छात्रों की अतिरिक्त हाजिरी अपनी मर्जी से लगाई थी।
भाषा शफीक सुरेश
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