मुंबई, 26 मई (भाषा) मुंबई की एक अदालत ने साइबर धोखाधड़ी के मामले में झारखंड के एक नागरिक को बरी करते हुए कहा है कि आपराधिक साजिश के सबूत के बिना केवल किसी व्यक्ति के बैंक खाते में ठगी की राशि का जमा होना अपराध नहीं माना जा सकता।
गिरगांव अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) एस जी चिमणकर ने पिछले सप्ताह दिए अपने फैसले में आरोपी मनोज किस्कू (23) को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा।
अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी प्रियंका हनुमंत पवार को 26 फरवरी 2022 को एक एसएमएस प्राप्त हुआ, जिसमें एचडीएफसी बैंक खाते को सक्रिय रखने के लिए पैन कार्ड को अपडेट करने को कहा गया था।
शिकायतकर्ता ने संदेश में दिए लिंक पर क्लिक कर फर्जी वेबसाइट पर बैंक संबंधी जानकारी भरी जिससे उनके खाते से 99,986 रुपये स्थानांतरित हो गए।
इसके बाद एक व्यक्ति ने उन्हें फोन कर ओटीपी मांगा था जिसे शिकायतकर्ता ने साझा कर दिया, जिसके बाद उनके खाते से 2,99,970 रुपये निकाल लिए गए।
मामले की जांच के मुताबिक, जिन नंबर से एसएमएस भेजने के साथ फोन किया गया था वह झारखंड के जामताड़ा निवासी रऊफ अंसारी के नाम पर पंजीकृत थे।
मामले में ठगी की राशि में से 99,986 रुपये किस्कू के बैंक खाते में पाए गए।
इसके बाद आरोपी को 17 मार्च 2023 को गिरफ्तार किया गया था और बाद में अक्टूबर 2023 में जमानत पर रिहा किया गया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि मुख्य आरोपी अंसारी को गिरफ्तार नहीं किया गया, जिसने सीधे शिकायतकर्ता से संपर्क कर धोखाधड़ी की थी।
अदालत ने कहा कि अभियोजन मामले में किस्कू की संलिप्तता साबित नहीं कर सका।
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प्रचेता वैभव
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