ठाणे की अदालत ने पुलिसकर्मियों पर हमले के मामले में पांच आरोपियों को बरी किया

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ठाणे की अदालत ने पुलिसकर्मियों पर हमले के मामले में पांच आरोपियों को बरी किया

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  • Publish Date - February 3, 2026 / 12:08 PM IST,
    Updated On - February 3, 2026 / 12:08 PM IST

ठाणे, तीन फरवरी (भाषा) ठाणे की एक अदालत ने 2020 में पुलिसकर्मियों पर हमला करने के मामले में पांच आरोपियों को गवाहियों में ‘‘स्पष्ट और असंगत’’ विरोधाभास, चिकित्सकीय पुष्टि या गवाहों का अभाव, ड्यूटी रिकार्ड नहीं होने तथा साझा मंशा या पूर्व नियोजित योजना का कोई सबूत नहीं होने का हवाला देते हुए बरी कर दिया।

उप निरीक्षक और एक अन्य पुलिसकर्मी ने आरोप लगाया था कि महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कलवा पुलिस थाने में सात फरवरी 2020 को हुई घटना के दौरान आरोपियों में से एक ने एक साथ उन दोनों के कॉलर पकड़ लिए थे।

अपर सत्र न्यायाधीश वी एल भोसले ने अभियोजन के दावों की तार्किक असंभवता की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘यह शारीरिक रूप से असंभव है। एक व्यक्ति एक साथ दो अलग-अलग व्यक्तियों के कॉलर नहीं पकड़ सकता। यह विरोधाभास किसी मामूली या गौण मुद्दे पर नहीं है बल्कि अभियोजन पक्ष के मामले के मूल मुद्दे से जुड़ा है यानी किसने किसे मारा।’’

यह आदेश 29 जनवरी को पारित किया गया था और इसकी प्रति सोमवार को उपलब्ध कराई गई।

अभियोजन के अनुसार, आरोपी कलवा पुलिस थाने में दाखिल हुए, वे आक्रामक हो गए और उन्होंने कुछ सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट की।

आरोपियों-चित्तरंजन भारती, पवन कुरिल, चंद्रकांत कुरिल, रूपाली कुरिल और सविता कुरिल-के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धाराओं 353 (लोक सेवक पर हमला), 504 (जानबूझकर अपमान करना), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 160 (झगड़ा) के तहत आरोप लगाए गए।

छठी आरोपी कंचन मोतीलाल कुरिल की मुकदमे के लंबित रहने के दौरान मौत हो जाने के कारण उसके खिलाफ मामला समाप्त हो गया।

बचाव पक्ष के वकीलों ने अभियोजन के मामले में कमियां उजागर कीं और आरोपियों पर लगे आरोपों को चुनौती दी।

अदालत ने चार पुलिस गवाहों की गवाही में ‘‘गंभीर खामियां’’ पाईं। अदालत ने यह भी पाया कि किसी भी प्रकार का चिकित्सीय साक्ष्य मौजूद नहीं था, जो कि हमले के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों के ड्यूटी पर होने की बात साबित करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्यों का अभाव है और संबंधित समय का कोई ड्यूटी रोस्टर एवं स्टेशन डायरी प्रविष्टियां भी प्रस्तुत नहीं की गईं।

अदालत ने कहा कि जब गवाह पुलिस अधिकारी हों, तो ड्यूटी रोस्टर और संबंधित दस्तावेजों का प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।

झगड़े (धारा 160) के आरोप पर अदालत ने कहा, ‘‘ ‘लड़ाई’ शब्द का अर्थ अनिवार्य रूप से आपसी संघर्ष है – एक ऐसी स्थिति जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे से सक्रिय रूप से लड़ रहे हों। एकतरफा हमला या आक्रमण ‘लड़ाई’ नहीं कहलाता।’’

अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ‘‘संभवतः सच’’ और ‘‘निश्चित रूप से सच’’ के बीच के अंतर को पाटने में विफल रहा।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अभियोजन आरोपियों के खिलाफ अपना मामला उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।’’

भाषा सिम्मी शोभना

शोभना