डॉ. हेडगेवार और प.पू. श्री गुरुजी : राष्ट्र-निर्माण एवं हिंदू संगठन का वैचारिक आधार

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HIGHLIGHTS
  • आज जब भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, तब इन दोनों महापुरुषों की राष्ट्र-दृष्टि पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ रही है। “Spiritualize the Religion – Nationalize the Man”- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह मौलिक सिद्धांत पिछले सौ वर्षों से उसके कार्य का दार्शनिक आधार रहा है।
  • संघ दो महत्वपूर्ण कार्य–मार्ग निर्धारित करता है— 1. “सर्वेषां अविरोधेन” — समाज के प्रत्येक घटक के साथ सामंजस्य, समन्वय और अविरोध का भाव। संगठन का विस्तार किसी के विरोध से नहीं, बल्कि सभी के साथ संवाद, सद्भाव और सहभागिता से। 2. “बहुमत से नहीं, सहमति से निर्णय” — संघ में निर्णय संख्या बल से नहीं, बल्कि सर्वसम्मति, निरहंकार चर्चा और साझा समाधान की भावना से किए जाते हैं।
  • गुरुजी ने ‘हिंदूराष्ट्र’ की अवधारणा को राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के रूप में परिभाषित किया। यह न किसी प्रभुत्व का विचार है, न किसी धार्मिक राज्य का। यह समान राष्ट्रीय स्मृति, समान कर्तव्य-भाव और सामाजिक समरसता पर आधारित एक समाज-केंद्रित राष्ट्रीयता है।

डॉ. हेडगेवार और प.पू. श्री गुरुजी : राष्ट्र-निर्माण एवं हिंदू संगठन का वैचारिक आधार

भारत का राष्ट्र-चेतना-विमर्श केवल राजनीतिक संघर्ष की कहानी नहीं; यह समाज की आत्मा, संस्कृति और संगठन को पुनर्जीवित करने की एक सदी-लंबी प्रक्रिया है। इस पुनर्जागरण के दो अनिवार्य स्तंभ—डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और प.पू. श्री गुरुजी माधवराव गोलवलकर—ने इस प्रक्रिया को वैचारिक गहराई, संगठनात्मक दिशा और दीर्घकालिक दृष्टि प्रदान की। दोनों की राष्ट्र-दृष्टि का मूल केंद्र था—एक संगठित, संस्कारित और आत्म-सम्मान से सम्पन्न समाज का निर्माण, जो विश्व-मानवता के लिए भी एक नैतिक विकल्प प्रस्तुत कर सके।

स्वराज्य का वास्तविक अर्थ : डॉ. हेडगेवार का मूल दृष्टिकोण

डॉ. हेडगेवार का राजनीतिक प्रवास कांग्रेस से आरम्भ हुआ। 1916–1920 के बीच वे कांग्रेस की विभिन्न समितियों व प्रस्ताव-विचार प्रक्रियाओं में सक्रिय रहे। नागपुर कांग्रेस (1920) में पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य बनाने का उनका प्रयास उस समय के नेतृत्व को अत्यधिक ‘राष्ट्रवादी’ प्रतीत हुआ। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जब हेडगेवार को यह स्पष्ट हुआ कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं—यह एक राष्ट्रीय पुनर्जागरण है, जिसके लिए समाज का जागरण और संगठन अनिवार्य है।

 

 

उनके अनुसार स्वतंत्रता की अवधारणा त्रिस्तरीय थी—

(1) राजनीतिक मुक्ति—विदेशी शासन से निजात
(2) मानसिक मुक्ति—दासता, भय और आन्तरिक विभाजनों से मुक्ति
(3) सामाजिक मुक्ति—एक अनुशासित, आत्मनिर्भर और संगठित समाज की स्थापना

वे स्पष्ट कहते थे—“जब समाज असंगठित होता है, तभी बाह्य सत्ता उसे गुलाम बना पाती है।” यह दृष्टि बाद में संघ-स्थापना का केंद्र-बिंदु बनी, जिसमें स्व-आधारित राष्ट्रीय तंत्र—स्व-शिक्षा, स्व-भाषा, स्व-धर्म और स्वावलंबी अर्थनीति—को स्वराज्य का वास्तविक आधार माना गया। हेडगेवार की वैश्विक चिंता केवल भारत-सीमित नहीं थी। वे यूरोपीय पूंजीवाद को मानवता के लिए संकट बताते हुए कहते थे कि यह मनुष्य को व्यक्तित्व नहीं, उपकरण बनाता है। भारत का मार्ग मानवता को इससे बचाने का विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रकार उनके चिंतन में भारत की स्वतंत्रता = विश्व को एक संतुलित, समन्वयी और नैतिक दिशा देने का अवसर था।

 प.पू. गुरुजी : हिंदू संगठन और विश्व-मानवता का सांस्कृतिक मॉडल

 

 


प.पू. श्री गुरुजी गोलवलकर ने हेडगेवार के विचारों को एक व्यापक सांस्कृतिक और वैश्विक आयाम दिया। उनका मानना था कि हिंदू जीवन-दर्शन केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एकात्मता और सामंजस्य का मार्ग है। उनके अनुसार हिंदू समाज को तीन बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी करनी होंगी—

(1) संरक्षण
मंदिर, तीर्थ, शिक्षण-परंपरा, परिवार, संस्कार—ये सब राष्ट्रीय चेतना के आधार-स्तंभ हैं। इन्हें सुरक्षित रखा जाये बिना समाज की आत्मा सुरक्षित नहीं रह सकती।
(2) मौलिकता
गुरुजी पश्चिमी अंधानुकरण से सावधान करते थे। उपभोक्तावाद के स्थान पर संयम, धर्महीन आधुनिकता के स्थान पर मूल्यनिष्ठ शिक्षा और मानव-केंद्रित प्रगति पर उनका आग्रह था।
(3) जीवन्तता
उनके अनुसार धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि आचरण, कर्तव्य, परिवार और पुरुषार्थ का एक व्यवहारिक ढाँचा है। समाज जब इन सिद्धांतों को व्यवहार में लाता है, तभी वह सशक्त बनता है।
गुरुजी ने ‘हिंदूराष्ट्र’ की अवधारणा को राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के रूप में परिभाषित किया। यह न किसी प्रभुत्व का विचार है, न किसी धार्मिक राज्य का। यह समान राष्ट्रीय स्मृति, समान कर्तव्य-भाव और सामाजिक समरसता पर आधारित एक समाज-केंद्रित राष्ट्रीयता है।

 दोनों का साझा लक्ष्य : संगठित, संस्कारित और दीर्घकालीन राष्ट्र-निर्माण

डॉ. हेडगेवार और गुरुजी की दृष्टि में भारत के पुनरुत्थान का मूल मंत्र था—एक जागरुक, निर्दोष, संगठित और सुदीर्घ समाज।
जागरुक समाज जिसके पास इतिहास-बोध, संस्कृति-बोध, कर्तव्य-बोध और चुनौतियों का विवेकपूर्ण विश्लेषण हो।
निर्दोष नागरिक  –  जो चरित्र, अनुशासन और नैतिकता में उच्च हो। दोनों कहते थे—“चरित्र-निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण का प्रथम सोपान है।”
संगठित समाज
हेडगेवार का सूत्र: “व्यक्ति जोड़ो—राष्ट्र स्वयं जुड़ जाएगा।”
गुरुजी का संकल्प: “संगठन संख्या नहीं—मन का एकत्व है।”
दीर्घकालिक राष्ट्र-दृष्टि – दोनों के अनुसार राष्ट्र-निर्माण त्वरित प्रक्रिया नहीं; यह धैर्य, तप, निरंतर सेवा और सतत संस्कारों का विषय है।

 भारत का स्वाभाविक लक्ष्य : ‘परम वैभव’

संघ के चिंतन में ‘परम वैभव’ का अर्थ किसी भौतिक सामर्थ्य तक सीमित नहीं। यह है— सांस्कृतिक समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान का उत्कर्ष, सामाजिक समरसता, आत्मनिर्भरता, चरित्रवान नागरिक, विश्व-मानवता के लिए आध्यात्मिक व नैतिक नेतृत्व दोनों महापुरुषों का विश्वास था—भारत का उदय विश्व में सामंजस्य, संतुलन और शांति की स्थापना का मार्ग बनेगा। क्योंकि भारत का दर्शन—वसुधैव कुटुम्बकम्—आज की विभाजित, उपभोक्तावादी और तनावग्रस्त विश्व-व्यवस्था के लिए एक शाश्वत समाधान है।

 भारत का पुनर्जागरण — समाज से राष्ट्र तक

डॉ. हेडगेवार और गुरुजी ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं; यह मनुष्य, समाज और संस्कृति—तीनों की पुनर्रचना है। उनकी दृष्टि में—
* स्वराज्य = स्व-आधारित व्यवस्था
* संगठन = राष्ट्र-शक्ति का मूल स्रोत
* हिंदूराष्ट्र = सांस्कृतिक राष्ट्रत्व
* भारत का उदय = विश्व-मानवता का नैतिक नेतृत्व

 आज जब भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, तब इन दोनों महापुरुषों की राष्ट्र-दृष्टि पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ रही है। “Spiritualize the Religion – Nationalize the Man”- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह मौलिक सिद्धांत पिछले सौ वर्षों से उसके कार्य का दार्शनिक आधार रहा है। इसका अर्थ है—धर्म को अनुष्ठानों तक सीमित न रखकर आध्यात्मिक मूल्य, आत्मानुशासन, करुणा, कर्तव्य-बोध और राष्ट्रनिष्ठा का जागरण; तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में राष्ट्र–केंद्रित चरित्र वाला बनाना।

इसी दृष्टि से संघ दो महत्वपूर्ण कार्य–मार्ग निर्धारित करता है—

1. “सर्वेषां अविरोधेन” — समाज के प्रत्येक घटक के साथ सामंजस्य, समन्वय और अविरोध का भाव। संगठन का विस्तार किसी के विरोध से नहीं, बल्कि सभी के साथ संवाद, सद्भाव और सहभागिता से।
2. “बहुमत से नहीं, सहमति से निर्णय” — संघ में निर्णय संख्या बल से नहीं, बल्कि सर्वसम्मति, निरहंकार चर्चा और साझा समाधान की भावना से किए जाते हैं।
यही दो सिद्धांत संघ को मात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रजीवन में सकारात्मक परिवर्तन की सतत साधना बनाते हैं। त्यांच्या चिंतन में निहित यह संदेश सदैव प्रासंगिक रहेगा—“जब समाज जागता है—राष्ट्र उठ खड़ा होता है; जब राष्ट्र उठता है—विश्व को दिशा मिलती है।”

– कैलाश चन्द्र

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और  वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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