खुद पर विश्वास कभी नहीं कम नहीं हुआ, सफर अभी बाकी है: सिंधू

खुद पर विश्वास कभी नहीं कम नहीं हुआ, सफर अभी बाकी है: सिंधू

खुद पर विश्वास कभी नहीं कम नहीं हुआ, सफर अभी बाकी है: सिंधू
Modified Date: July 19, 2026 / 09:41 pm IST
Published Date: July 19, 2026 9:41 pm IST

नयी दिल्ली, 19 जुलाई (भाषा) दो बार की ओलंपिक पदक विजेता पीवी सिंधू ने रविवार को कहा कि उन्होंने कभी खुद पर विश्वास करना नहीं छोड़ा था और जापान ओपन सुपर 750 का खिताब जीतने से उन्हें यह भरोसा फिर मिला है कि उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अभी बाकी है।

सिंधू ने जापान की अकाने यामागुची को सीधे गेमों में हराकर दो साल बाद अपना पहला बड़ा खिताब जीता। इस जीत के साथ वह जापान ओपन का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी भी बन गईं।

भारतीय बैडमिंटन संघ (बीएआई) द्वारा आयोजित ऑनलाइन बातचीत में सिंधू ने कहा, ‘यह जीत काफी लंबे समय से प्रतीक्षित और बेहद जरूरी थी। यह निश्चित रूप से मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली जीत है। इससे मुझे आगे और बेहतर करने का भरोसा मिला है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे विश्वास हुआ है कि हां, मैं यह कर सकती हूं और अभी सफर खत्म नहीं हुआ है। आगामी विश्व चैंपियनशिप से पहले यह जीत पाकर मैं बहुत खुश हूं।’’

उन्होंने आलोचनाओं और अपने प्रदर्शन को लेकर उठे सवालों पर कहा, ‘‘कई तरह की बातें सुनने को मिलती हैं, लेकिन उनका जवाब देने से ज्यादा मैं यह कहना चाहूंगी कि मुझे खुद पर विश्वास है। हां, काफी समय हो गया था और मेरे लिए यह खिताब बहुत-बहुत महत्वपूर्ण है।’’

सिंधू ने स्वीकार किया कि पिछले करीब दो वर्षों का दौर उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा, जिसमें उन्हें छोटी-छोटी चोटों और परेशानियों से भी जूझना पड़ा।

उन्होंने कहा, ‘‘यह काफी कठिन सफर रहा, क्योंकि मुझे कुछ छोटी चोटों और परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक खिलाड़ी के जीवन में चोट लगना स्वाभाविक है। यह खेल का हिस्सा है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मजबूत वापसी की जाए। इसमें मुझे कुछ समय लगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कभी छोटी चोट लगी, फिर मैंने वापसी की, उसके बाद दोबारा चोट से जूझना पड़ा। इसके बाद अपनी पुरानी लय हासिल करना आसान नहीं था।’’

सिंधू ने अपनी सफलता का श्रेय अपने सहयोगी स्टाफ और कोच देते हुए कहा, ‘‘मेरे सहयोगी स्टाफ और मेरे कोच ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की। मैं बहुत खुश हूं कि मैं यह कर सकी, जीत हासिल कर सकी और उन्हें यह सफलता समर्पित कर सकी।’’

भाषा आनन्द

आनन्द


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