मैरी कॉम से जैस्मीन तक, छोटे लाल यादव की कोचिंग की विशिष्ट शैली ने उन्हें द्रोणाचार्य बनाया

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मैरी कॉम से जैस्मीन तक, छोटे लाल यादव की कोचिंग की विशिष्ट शैली ने उन्हें द्रोणाचार्य बनाया

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  • Publish Date - August 19, 2026 / 01:17 PM IST,
    Updated On - August 19, 2026 / 01:17 PM IST

(अपराजिता उपाध्याय)

नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) दिग्गज एमसी मैरी कॉम के करियर को आगे बढ़ाने से लेकर जैस्मीन लैंबोरिया को विश्व चैंपियन में बदलने तक, छोटे लाल यादव ने प्रत्येक मुक्केबाज की जरूरतों को समझकर अपना कोचिंग करियर बनाया है, एक ऐसा दृष्टिकोण जिसने उन्हें प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार दिलाया है।

सेना में कार्यरत 38 वर्षीय छोटे लाल काफी हद तक चर्चाओं से दूर रहे जबकि उनसे कोचिंग लेने वाले मुक्केबाज सुर्खियों में रहे।

मैरी कॉम की वापसी, जैस्मीन का विश्व खिताब तथा साक्षी चौधरी और अरुंधति चौधरी के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक उस यात्रा के निर्णायक मील के पत्थर हैं जो तब शुरू हुई जब चोट ने यादव को रिंग से कोचिंग की तरफ मोड़ दिया।

यादव ने पीटीआई से कहा, ‘‘मैं बहुत खुश हूं, लेकिन मुझे यहीं नहीं रुकना है। मुझे और मेहनत करनी होगी। मेरा लक्ष्य है कि मेरे मुक्केबाज लॉस एंजिलिस ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतें।’’

एक मुक्केबाज के रूप में यादव 2001 से 2012 तक राष्ट्रीय टीम का हिस्सा रहे और वह सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर वर्ग में भी खेले। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भाग लिया। यादव ने एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और 2008 से 2010 तक लगातार तीन वर्षों तक फीदरवेट वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियन रहे।

उन्हें 2000 में वाराणसी से पुणे स्थित सेना की ‘बॉयज़ स्पोर्ट्स कंपनी’ में लाया गया था और वह 2005 में सेना में शामिल हो गए।

लेकिन 2012 में पीठ की चोट ने मुक्केबाज के रूप में ओलंपिक में भाग लेने की उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इसके बाद उन्होंने मुक्केबाजी तो नहीं छोड़ी, लेकिन अपनी भूमिका बदल ली। कोचिंग से उनका पहला गंभीर परिचय उसी साल हुआ जब उन्हें मैरी कॉम की मदद करने के लिए कहा गया। यह उनके कोचिंग करियर का महत्वपूर्ण मोड़ था।

यादव ने 2014 में पटियाला स्थित राष्ट्रीय खेल संस्थान से कोचिंग डिप्लोमा पूरा किया और 2017 तक वह मैरी कॉम के साथ पूर्णकालिक रूप से काम करते रहे।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे प्रशिक्षण लेने से पहले ही वह चैंपियन थी। मेरी सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक दिग्गज खिलाड़ी और चैंपियन को चैंपियन कैसे बनाए रखा जाए।’’

उस समय तक मैरी कॉम पांच बार की विश्व चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता बन चुकी थीं। यादव का काम उन्हें चैंपियन बनना सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें चैंपियन बनाए रखने के तरीके खोजना था।

उन्होंने ‘स्मार्ट ट्रेनिंग’ की पद्धति अपनाई जिसमें उम्र और शारीरिक जरूरतों के अनुसार उनका कार्यभार प्रबंध करना था।

यादव ने कहा, ‘‘‘उस समय यह मेरे लिए एक चुनौती थी, मुझे पूरी तरह से विश्वास नहीं था कि कारगर साबित होगी या नहीं लेकिन यह कारगर साबित हुई।’’

इसका जल्द ही सकारात्मक परिणाम सामने आया। मैरी कॉम ने 2018 में एशियाई चैंपियनशिप जीती। उन्होंने उसी वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों और विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीते।

उन्होंने कहा, ‘‘एशियाई खेल 2014 में स्वर्ण पदक जीतने के बाद से मैरी ने किसी बड़े टूर्नामेंट में कोई जीत हासिल नहीं की थी और ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई नहीं कर पाई थीं। इसलिए इस जीत से मुझे बहुत खुशी मिली।’’

अपनी कोचिंग पद्धति के बारे में यादव ने कहा, ‘‘मैं हर मुक्केबाज के लिए व्यक्तिगत प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करता हूं।’’

इसके बाद उन्होंने अन्य महिला मुक्केबाजों को भी प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनके मार्गदर्शन में जैस्मीन पिछले साल विश्व चैंपियन बनीं, जबकि साक्षी और अरुंधति ने इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीते।

जैस्मीन ने कहा, ‘‘छोटे सर को महिला मुक्केबाजों के बारे में सब कुछ पता है। प्रशिक्षण कैसे देना है, रिकवरी कैसे करनी है। वे बहुत खुले विचारों वाले हैं, इसलिए हम उनसे बेझिझक बात कर पाते हैं।’’

भाषा

पंत

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