अदालत की पूर्वानुमति के बगैर की गई आगे की पुलिस जांच वैध नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
अदालत की पूर्वानुमति के बगैर की गई आगे की पुलिस जांच वैध नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
लखनऊ, 20 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को कहा कि अदालत की पूर्व अनुमति के बगैर की गई विस्तृत पुलिस जांच को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एक ही आपराधिक मामले में दो बार संज्ञान लेना कानूनी रूप से मान्य नहीं है। अदालत ने पूरक आरोपपत्र, दूसरा संज्ञान आदेश और आरोपमुक्ति आवेदन खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की पीठ ने यह आदेश सैयद मोहम्मद हमजा द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत दायर याचिका पर दिया।
याचिका के अनुसार, वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले के मालीपुर थाने में एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिस द्वारा दायर पहले आरोप पत्र में याचिकाकर्ता के खिलाफ हत्या का आरोप नहीं लगाया गया था।
बाद में पुलिस अधीक्षक (एसपी) के निर्देश पर जांच अधिकारी ने विस्तृत जांच की और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 201 (अपराध के साक्ष्य मिटाना या अपराधी को बचाने के लिए गलत जानकारी देना) के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जांच शुरू करने से पहले निचली अदालत से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, जबकि प्रमोद कुमार बनाम उत्तर प्रदेश मामले में उच्चतम न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि इसके लिए अदालत की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पीठ के समक्ष स्वीकार किया कि आगे की जांच पुलिस अधीक्षक (एसपी) के निर्देश पर और अदालत की पूर्व अनुमति लिए बिना की गई थी।
भाषा सं. सलीम जोहेब
जोहेब

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