शाहजहांपुर में ‘लाट साहब’ जुलूस मार्ग की 48 मस्जिद-मजार तिरपाल से ढकीं, सुरक्षाबल तैनात
शाहजहांपुर में ‘लाट साहब’ जुलूस मार्ग की 48 मस्जिद-मजार तिरपाल से ढकीं, सुरक्षाबल तैनात
शाहजहांपुर (उप्र), 23 फरवरी (भाषा) शाहजहांपुर जिले में होली पर निकलने वाले ‘लाट साहब’ के जुलूस में ‘जूतामार होली’ के मद्देनजर जुलूस मार्ग की मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया गया है तथा प्रशासन इस बार पिछले वर्ष की तुलना में डेढ़ गुना अधिक पुलिसबल और 200 से ज्यादा मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारियों की तैनाती करेगा। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी।
पुलिस अधीक्षक राजेश द्विवेदी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि जुलूस में चार अपर पुलिस अधीक्षक, 13 पुलिस क्षेत्राधिकारी, 310 दरोगा, 1200 सिपाही और 500 होमगार्ड जवानों के अलावा चार-चार कंपनियां प्रादेशिक आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पीएसी) तथा त्वरित कार्रवाई बल (आरएएफ) की और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की टीम तैनात की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि शहर के आठ किलोमीटर के दायरे में निकलने वाले बड़े और छोटे ‘लाट साहब’ के जुलूस पर नजर रखने के लिए 100 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पिछले वर्ष हुए कुछ विवाद के मद्देनजर इस बार जुलूस में एक अतिरिक्त जोन बनाया गया है और पिछले एक महीने से सभी थानों-चौकियों पर विभिन्न समुदायों के लोगों के साथ शांति समिति की बैठकें की जा रही हैं।
अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) रजनीश कुमार मिश्रा ने बताया कि जुलूस मार्ग में पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को प्लास्टिक तिरपाल से ढक दिया गया है।
उन्होंने बताया कि साथ ही मार्ग से जुड़ी 148 गलियों को अवरुद्ध कर वहां अवरोधक लगाए जाएंगे ताकि अचानक भीड़ न उमड़े। उन्होंने बताया कि होलिका दहन स्थलों पर भी 103 मजिस्ट्रेट तैनात रहेंगे।
स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉक्टर विकास खुराना के अनुसार, यह परंपरा बेहद रोचक है।
उन्होंने बताया, ‘‘शाहजहांपुर में रहने वाले नवाब अब्दुल्ला खान अपने परिवार से नाराज होकर फर्रुखाबाद चले गए थे और 1728 में जब लौटे तो संयोग से उस दिन होली थी। तब हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने उनके साथ होली खेली और शहर का चक्कर लगाया, तभी से यह परंपरा शुरू हुई।’’
उन्होंने बताया कि साल 1859 में अंग्रेजों ने शाहजहांपुर पर फिर से कब्जा कर लिया और उसके बाद जिला प्रशासन स्वयं नवाब साहब के जुलूस का आयोजन करने लगा।
खुराना ने बताया, ‘‘आजादी के बाद कई दशकों तक इसे ‘नवाब साहब का जुलूस’ कहा जाता रहा, लेकिन 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम ‘लाट साहब का जुलूस’ कर दिया।’’
उन्होंने बताया, ‘‘समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदलता गया और ‘लाट साहब’ को जूते-चप्पलों से मारने की परंपरा शुरू हो गई। प्रचलित परंपरा के अनुसार होली के दिन एक व्यक्ति को ‘लाट साहब’ बनाया जाता है और उसे भैंसा गाड़ी पर तख्त रखकर बैठाया जाता है।’’
खुराना ने कहा, ‘‘जुलूस फूलमती देवी मंदिर से शुरू होकर कोतवाली पहुंचता है, जहां ‘लाट साहब’ कोतवाल से सालभर के अपराधों का हिसाब मांगते हैं। इसके बाद जुलूस आठ किलोमीटर के दायरे में घूमता है और हजारों हुरियारे ‘लाट साहब की जय’ के नारे लगाते हुए उन पर जूते-चप्पल बरसाते हैं।’’
उन्होंने बताया कि 1990 में रामनाथ बघेल ने जुलूस रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, लेकिन अदालत ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।
लाट साहब के जुलूस को शाहजहांपुर के हिंदू और मुसलमान दोनों ही समुदाय के लोगों का सहयोग मिलता है। वे जुलूस का स्वागत पुष्पवर्षा से करते हैं।
समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष तनवीर खान ने कहा, ‘‘यह जुलूस हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। इंशाअल्लाह, इस बार जुलूस खुशी के माहौल में निकलेगा।’’
कांग्रेस की नगर इकाई के अध्यक्ष तकवीम हसन खान ने कहा कि यह ठीक है कि जिला प्रशासन ‘लाट साहब’ के जुलूस से पहले मस्जिदों और मजारों को ढक देता है लेकिन हमारा दिल भी बड़ा है।
उन्होंने कहा, ‘‘इससे पहले जब कभी होली शुक्रवार के दिन मनाई गई तो हम लोगों ने जुमे की नमाज देरी से पड़ी ताकि हमारे हिंदू भाई अपने समय से होली खेल सकें।’’
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिकित्सक डॉ. नमिता सिंह ने कहा, ‘‘हमारी टीम की महिलाएं भी पूरे जोश के साथ हिस्सा लेती हैं और शहर से निकलने वाले ‘लाट साहब’ के जुलूस पर पुष्पवर्षा करती हैं।’’
सामाजिक कार्यकर्ता इमरान खान ने कहा कि शहीदों के इस शहर में हिंदू और मुस्लिम मिलकर सभी त्योहारों को बहुत प्रेम से मनाते हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले साल ‘लाट साहब’ के जुलूस के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कई जगहों पर जुलूस पर पुष्पवर्षा की थी।
भाषा सं. सलीम खारी
खारी

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