Niranjan Pradhan targeted Akhilesh Yadav/Image Credit: AI
Niranjan Pradhan targeted Akhilesh Yadav: लखनऊ: राजनीति में विपक्ष को सत्ता की आलोचना का अधिकार है लेकिन इसका आधार बहुत मजबूत और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। तथ्य यदि सही नहीं होंगे तो इसका प्रभाव उलटा पड़ना तय है क्योंकि वर्तमान दौर में जनता बहुत जागरूक है और सही-गलत का आकलन भी बहुत जल्द कर लेती है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से प्रेस कान्फ्रेंस में पेश किए गए आंकड़े भी इस समय उपहास का केंद्र बने हुए हैं तो इसकी मुख्य वजह उनके बयान का तथ्यों से परे दिखाई देना है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसी क्या मजबूरी है कि अखिलेश को सार्वजनिक स्तर पर बेबुनियाद बातें रखने की जरूरत पड़ी? क्या वह वाकई महसूस करने लगे हैं कि अगले चुनाव में उनकी पार्टी की स्थिति अच्छा नहीं रहने वाली? उनकी प्रेस कान्फ्रेस के बाद ही सत्ताधारी दल के नेताओं को यह कहने का अवसर मिल गया कि ‘अपनी हार तय जान अखिलेश यादव बौखला गए हैं और भ्रामक व निराधार तथ्यों से जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं।’
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का दावा है कि उत्तर प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में 26 हजार से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं। किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में स्कूलों की बंदी के बारे में नहीं सोचा जा सकता। योगी सरकार ने बेसिक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए स्कूलों के विलय का निर्णय लिया था। इसके सार्थक परिणाम भी सामने आए हैं। सरकार का काम अनियोजित क्रियाकलापों को नियोजित रूप से आगे बढ़ाने का है, इसीलिए 19,000 ऐसे विद्यालय, जो एक ही परिसर में अलग-अलग भवनों या शिफ्टों में संचालित हो रहे थे, उन्हें प्रशासनिक सुविधा और संसाधनों के बेहतर उपयोग के मकसद से आपस में मर्ज किया गया। इसके अतिरिक्त 5,913 ऐसे विद्यालय, जिनमें छात्र संख्या 50 से कम थी और जो किसी अन्य स्कूल से एक किलोमीटर के दायरे में स्थित थे, उनके भी विलय का फैसला लिया गया।
गौरतलब है कि विलय का अर्थ बंदी नहीं होता और इसीलिए बेसिक शिक्षा मंत्री पूरे दावे के साथ प्रमाण देने में जुटे कि विलय किए गए स्कूलों के भवनों में भी पढ़ाई नहीं बंद हुई, बल्कि वहां अब प्री-प्राइमरी यानी बाल वाटिका की कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। इससे न तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है और न ही किसी शिक्षक की नौकरी पर असर पड़ा है। मंत्री के अनुसार वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 1,32,773 परिषदीय विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त 71,877 बाल वाटिकाएं भी काम कर रही हैं। किसी भी बयान को लेकर जनता के बीच जाने से पहले हकीकत जानना जरूरी है। राज्य के सबसे प्रमुख विपक्षी दल का नेता होने के नाते अखिलेश यादव को प्रेस कान्फ्रेंस से पहले ही इन तथ्यों की पड़ताल करनी या करानी चाहिए थी। सच तो यह है कि सरकार प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने और प्री-प्राइमरी स्तर पर सुविधाएं बढ़ाने पर लगातार काम कर रही है। नए शिक्षकों की नियुक्ति भी जारी है। कैबिनेट मंत्री ओपी राजभर ने अखिलेश को सही ही सलाह दी है कि वह कन्नौज के किसी सरकारी स्कूल का दौरा करें, ताकि उन्हें मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और पहले के दौर के अंतर का अंदाजा हो सके।
Niranjan Pradhan targeted Akhilesh Yadav: शिक्षा किसी भी राज्य का सबसे संवेदनशील मसला होता है, क्योंकि यह प्रदेश व बच्चों के भविष्य से सीधे तौर पर जुड़ता है। विशेष तौर पर भर्तियों को राजनीति का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए, वह भी उस स्थिति में जबकि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में ही भर्तियों का सबसे बुरा हाल था। भर्तियों को लेकर योगी सरकार में पारदर्शिता और शुचिता आई है तो युवाओं का इनके प्रति विश्वास भी बढ़ा है। अखिलेश का यह कहना कि योगी सरकार में 20 से अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हुए, कहीं से भी तार्किक नहीं प्रतीत होता क्योंकि योगी सरकार ने ही सर्वप्रथम नकल माफिया और पेपर लीक के मामलों में कड़े कदम उठाए। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल माफियाओं पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए ‘उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) जैसा अधिनियम लाने का हौसला पहले किसी भी सरकार का नहीं हुआ था। सपा सरकार में भर्तियों की क्या स्थिति थी, यह सभी जानते हैं। खुलेआम पद बेचे जा रहे थे और कहीं सुनवाई नहीं होती थी।
एक और मसला अखिलेश यादव ने उठाया है और वह है आरक्षण का। इस मामले को लेकर उनसे गंभीरता की उम्मीद की जाती है लेकिन उन्होंने भी इसे लेकर राजनीति का प्रयास किया। उन्हें याद करना चाहिए कि उनके ही शासनकाल में त्रिस्तरीय आरक्षण का निर्णय लिया गया था जिसको लेकर युवा सड़क पर उतरे थे और हाई कोर्ट में मामला जाने के बाद उन्हें यह निर्णय वापस लेना पड़ा था। आऱक्षण को लेकर केंद्रीय नीतियां स्पष्ट हैं और योगी सरकार में इसका पालन भी किया जा रहा है। वस्तुतः सपा अध्यक्ष भ्रम फैलाने की राजनीति करते हैं। विशेष तौर पर उनकी कोशिश है कि युवाओं को बरगलाया जाए। वह चाहते हैं कि गरीबों के बच्चे सड़कों पर उतरें, दंगा-फसाद में शामिल हों और फिर उनके खिलाफ कार्रवाई होने पर उन्हें घड़ियाली आंसू बहाने का मौका मिले। यह विडंबना ही है कि आम परिवारों के बच्चों को सड़क पर उतार कर मुकदमों और पुलिस कार्रवाई का सामना कराने वालों के अपने बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
Niranjan Pradhan targeted Akhilesh Yadav: राजनीति का स्तर यदि ऊंचा रहे तो इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है। आलोचना भी स्वस्थ ही रहनी चाहिए। विपक्षी दल के नेता योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश जरूर करें, लेकिन वास्तविक तथ्यों की अनदेखी उचित नहीं है। इन तथ्यों से कौन इनकार कर सकता है कि 2017 के बाद से प्रदेश के 18 विश्वविद्यालयों को NAAC (नेशनल असेसमेंट एंड एक्रिडिटेशन काउंसिल) से उत्कृष्ट श्रेणी की मान्यता मिली है, जिनमें 9 विश्वविद्यालय A++, 4 विश्वविद्यालय A+ और 5 विश्वविद्यालय A ग्रेड में शामिल हैं। इसके साथ ही सरकार ने ‘एक मंडल, एक विश्वविद्यालय’ के संकल्प के तहत कई नए राज्य विश्वविद्यालय स्थापित किए हैं, जिनमें मां विंध्यवासिनी विश्वविद्यालय, मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय, मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय और अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान शामिल हैं।
वस्तुतः अखिलेश यादव की तिलमिलाहट कई मसलों को लेकर है, उनमें एक जौहर विश्वविद्यालय भी है। इसको लेकर उनकी बेचैनी व नाराजगी तो समझ में आती है क्योंकि उनके ही शासनकाल में नियमों की अनदेखी कर एक नेता को लाभ पहुंचाने के लिए इस यूनिवर्सिटी को खड़ा किया गया। लेकिन यदि जनता ही उन पर भरोसा नहीं कर रही तो इसके कारण उन्हें खुद तलाशने होंगे। जनता की उदासीनता की खीज औरों पर उतारना ठीक नहीं।
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