वाराणसी (उप्र), 19 मई (भाषा) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर (एमए-इतिहास) के प्रश्न पत्र में ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ पर उठाये गए सवाल को लेकर ब्राह्मण समाज में रोष व्याप्त हो गया है।
कांग्रेस ने एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के प्रश्नपत्र में विवादित सवाल पूछे जाने को दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक करार देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से इस सवाल का वापस लेने की मांग की है।
हालांकि इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से कोई भी आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
विद्यार्थियों ने बताया कि एमए-इतिहास के चौथे सेमेस्टर के प्रश्न पत्र में एक सवाल पूछा गया, ‘‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से आप क्या समझते है? चर्चा कीजिये कि किस प्रकार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली।’’
इस मामले की जानकारी मिलते ही ब्राह्मण समाज में नाराजगी फैल गयी।
ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जानबूझकर एक खास विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है और एक विशेष वर्ग को लगातार निशाना बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
कांग्रेस पार्टी के महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चाबे ने कहा कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में एमए इतिहास के प्रश्नपत्र में जिस प्रकार का विवादित प्रश्न पूछा गया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों का कार्य समाज को जोड़ना, जागरूक करना और तथ्यपरक इतिहास प्रस्तुत करना होता है, लेकिन अब लगातार पाठ्यक्रमों और इतिहास लेखन में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ता दिखाई दे रहा है।
चाबे ने कहा कि 2014 के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ा है और इतिहास को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करने के बजाय उसे राजनीतिक एवं वैचारिक दृष्टिकोण से गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ जैसे शब्दों को जिस प्रकार प्रश्नपत्रों में शामिल किया जा रहा है, उससे समाज के एक वर्ग विशेष के प्रति नकारात्मक सोच उत्पन्न करने का प्रयास दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक प्रयोगशाला बनाना और विद्यार्थियों के मन में भ्रम एवं वैमनस्य पैदा करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
चाबे ने विश्वविद्यालय प्रशासन से इस प्रश्न को वापस लेने की मांग की और कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में शिक्षण संस्थानों का उपयोग किसी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के लिए ना हो।
भाषा सं. सलीम राजकुमार
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