उप्र में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर उच्च न्यायालय चिंतित, पुलिस के ‘सुस्त’ रवैये पर नाराज

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उप्र में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर उच्च न्यायालय चिंतित, पुलिस के 'सुस्त' रवैये पर नाराज

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  • Publish Date - February 5, 2026 / 12:38 AM IST,
    Updated On - February 5, 2026 / 12:38 AM IST

लखनऊ, चार फरवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या का बुधवार को स्वत: संज्ञान लेते हुए अदालत की रजिस्ट्री को जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया।

अदालत ने पाया कि पिछले दो सालों में एक लाख आठ लाख से ज्यादा लोग लापता हुए हैं, मगर पुलिस ‘सुस्त रवैया’ दिखाते हुए सिर्फ 9700 मामलों में ही कार्रवाई की है।

अदालत ने हालात पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि उसके सामने रखे गए आंकड़े ‘चौंकाने वाले’ हैं। पीठ ने टिप्पणी की, ”हम लापता लोगों से जुड़ी शिकायतों पर अधिकारियों के रवैये से हैरान हैं जिसमें साफ तौर पर अधिकारियों की तरफ से तुरंत कार्रवाई की ज़रूरत है।”

न्यायमूर्ति अब्दुल मुईन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने ये टिप्पणियां विक्रमा प्रसाद की एक याचिका की सुनवाई के दौरान कीं। प्रसाद ने आरोप लगाया था कि उनका बेटा जुलाई 2024 में लापता हो गया था और पुलिस ने उसे ढूंढने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

पीठ ने सुनवाई के दौरान गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव से एक विस्तृत हलफनामा मांगा। हलफनामे के अनुसार एक जनवरी 2024 और 18 जनवरी 2026 के बीच पूरे राज्य में लगभग एक लाख आठ हजार 300 लोगों की गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज की गईं लेकिन लापता व्यक्तियों को ढूंढने के लिए सिर्फ नौ हजार 700 मामलों में ही कार्रवाई की गई। बाकी मामलों में अभी तक कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी।

पीठ ने इन आंकड़ों पर ध्यान देते हुए पुलिस के ‘सुस्त रवैये’ पर नाराजगी जताई और इस मुद्दे को व्यापक जनहित का मामला मानते हुए अदालत की रजिस्ट्री को इस मामले को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई पांच फरवरी को सूचीबद्ध की जाए।

भाषा सं. सलीम राजकुमार

राजकुमार