(हैमंड पीयर्स, एलेग्जेंड्रा वसार और राहत मसूद – यूएनएसडब्ल्यू सिडनी)
सिडनी, 19 जनवरी (द कन्वरसेशन) दुनिया के पहले सोशल मीडिया आधारित ‘वॉरगेम’ से यह खुलासा हुआ है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से संचालित बॉट न केवल बड़े पैमाने पर गलत सूचना फैला सकते हैं, बल्कि संगठित तरीके से चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
यह बात ऐसे समय में सामने आयी है, जब वैश्विक स्तर पर सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों और डीपफेक सामग्री को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
एआई बॉट एआई पर आधारित सॉफ्टवेयर प्रोग्राम होता है, जो इंसानों की तरह बातचीत करने, सवालों के जवाब देने और काम करने में सक्षम होता है।
रिपोर्ट में 14 दिसंबर 2025 को ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित बॉन्डी बीच पर हुए आतंकी हमले का उल्लेख किया गया है, जिसमें 15 नागरिकों और एक हमलावर की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद, जब देश सदमे में था, सोशल मीडिया पर एआई की मदद से तैयार की गई भ्रामक सामग्री तेजी से फैलने लगी।
न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर क्रिस मिंस का छेड़छाड़ करके तैयार किया गया एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें दावा किया गया कि हमलावरों में से एक भारतीय नागरिक था। इसके अलावा, सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक कथित ‘नायक’ का महिमामंडन किया गया और मानवाधिकार वकील आर्सेन ओस्ट्रोव्स्की की एक डीपफेक तस्वीर साझा की गई, जिसमें उन्हें संकट में फंसे अभिनेता के रूप में दिखाया गया। सात अक्टूबर को इजराइल में हमास के हमले में ओस्ट्रोव्स्की बाल बाल बचे थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। वेनेजुएला, गाजा और यूक्रेन जैसे क्षेत्रों से संबंधित खबरों में भी एआई द्वारा तैयार की गई गलत सूचनाओं का व्यापक प्रसार देखा गया है।
अनुमान है कि वर्तमान में ऑनलाइन दिखाई देने वाली लगभग आधी सामग्री किसी न किसी रूप में एआई द्वारा बनाई या प्रसारित की जा रही है। जनरेटिव एआई न केवल यथार्थ जैसी तस्वीरें और वीडियो बना सकता है, बल्कि नकली सोशल मीडिया प्रोफाइल और बॉट तैयार कर गलत सूचनाओं को विश्वसनीय दिखाने में भी सक्षम है।
इन खतरों को समझने के लिए ‘कैप्चर द नैरेटिव’ नामक एक अनूठा प्रयोग किया गया। इसे दुनिया का पहला सोशल मीडिया वॉरगेम बताया गया है, जिसमें छात्रों को काल्पनिक चुनाव को प्रभावित करने के लिए एआई बॉट तैयार करने की अनुमति दी गई। इस प्रतियोगिता में ऑस्ट्रेलिया के 18 विश्वविद्यालयों की 108 टीमों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों को वामपंथी रुझान वाले उम्मीदवार ‘विक्टर’ या दक्षिणपंथी उम्मीदवार ‘मरीना’ के पक्ष में माहौल बनाने का लक्ष्य दिया गया।
चार सप्ताह तक चले इस प्रयोग में 70 लाख से अधिक पोस्ट किए गए, जिनमें 60 प्रतिशत से ज्यादा सामग्री एआई बॉट द्वारा तैयार की गई थी। बॉट ने झूठे और काल्पनिक दावों का सहारा लेते हुए भावनात्मक भाषा का इस्तेमाल किया।
इन पोस्ट को प्रयोगकर्ताओं तथा दूसरे लोगों ने देखा और मतदान किया। नतीजतन, बेहद मामूली अंतर से ‘विक्टर’ की जीत हुई। जब बिना किसी बॉट हस्तक्षेप के दोबारा चुनाव किया गया, तो ‘मरीना’ 1.78 प्रतिशत के अंतर से जीत गईं।
अध्ययन के अनुसार, यह साबित करता है कि कम लागत वाले, उपभोक्ता-स्तर के एआई टूल्स से भी प्रभावी गलत सूचना अभियान चलाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति में डिजिटल साक्षरता को मजबूत करना बेहद जरूरी है, ताकि लोग ऑनलाइन फर्जी और भ्रामक सामग्री को पहचान सकें और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुरक्षित रखा जा सके।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव
वैभव