एना गोल्ड्सवर्दी की चेतावनी: एआई में छिपा है इंसान का ही अक्स

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एना गोल्ड्सवर्दी की चेतावनी: एआई में छिपा है इंसान का ही अक्स

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  • Publish Date - June 26, 2026 / 06:12 PM IST,
    Updated On - June 26, 2026 / 06:12 PM IST

(निउशा शफियाबादी, ऑस्ट्रेलियन कैथोलिक यूनिवर्सिटी)

सिडनी, 26 जून (द कन्वरसेशन) संगीतकार और लेखिका एना गोल्ड्सर्दी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अपने नए त्रैमासिक लेख में लिखती हैं, ‘जैसा कि हमें हमेशा से शक था’, ‘वह ईश्वर जो हमें खत्म कर सकता है, वह हम खुद ही हैं।’ यह वाक्य इस निबंध के सार को बताता है: यह इस बात पर एक निजी चिंतन है कि एआई मानवता के बारे में क्या बताता है। वह लॉजिक गेट्स या क्वांटम चिप्स के बारे में नहीं, बल्कि इस तकनीक के नैतिक, रचनात्मक और यहां तक कि धार्मिक निहितार्थों पर विचार करती हैं।

गोल्ड्सवर्दी बड़ी कुशलता से एआई की समझ रखने वाले अपने बच्चों के साथ बातचीत और एआई से जुड़े अस्तित्व के खतरों, शिक्षा, काम-काज, कला, अकेलेपन, साहचर्य, कॉर्पोरेट शक्ति और भविष्य पर विचार करती हैं। वह सवाल करती हैं कि क्या इंसानियत इतनी समझदार है कि वह ऐसी तकनीक के साथ रह सके जो उसकी कमजोरियों को और बढ़ा देती है।

गोल्ड्सवर्दी एआई (जिससे उनका मुख्य आशय जेनरेटिव एआई से है) को किसी राक्षस के बजाय एक आईने की तरह देखती हैं। उनकी सबसे प्रभावशाली समझ यह है कि एआई हमारे लिए कोई बेगाना नहीं है। इसने इंसानी लेखों के विशाल संग्रह से सीखा है: जिसमें न केवल उपयोगी हिस्से शामिल हैं, बल्कि टालमटोल, कल्पनाएँ, क्रूरताएँ और दिलासा देने वाली बातें भी हैं।

उनकी धार्मिक व्याख्या इसलिए प्रभावशाली बनती है क्योंकि शीर्षक में जिस ‘ईश्वर’ का उल्लेख है, वह कहीं बाहर से आया देवता नहीं है, बल्कि हमारी ही बनाई हुई ऐसी शक्ति है, जिस पर हमारे अपने निशान मौजूद हैं।

तकनीकी तौर पर देखें तो गोल्ड्सवर्दी जिन समय-सीमा की बात करती हैं – ‘आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस’ (एक काल्पनिक एआई व्यवस्था जिसकी क्षमताएं लगभग सभी संज्ञानात्मक क्षेत्रों में इंसानों के बराबर हों) और ‘आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस’ के लिए वे अभी भी सिर्फ अनुमान पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, जब गोल्ड्सवर्दी स्वचालन (ऑटोमेशन) पर चर्चा करती हैं, तो असल मुद्दा यह नहीं है कि मशीनें सचेत हैं या नहीं, बल्कि यह है कि कहीं इंसानों को ‘अर्थपूर्ण कार्यों (रोज़गार) से मुक्त’ न कर दिया जाए। वह सवाल उठाती हैं कि हम बिना सोचे-समझे हर चीज़ का ऑटोमेशन क्यों कर रहे हैं, और क्या हम सचमुच ‘हर तरह की प्रक्रिया से मुक्त’ होना चाहते हैं।’

मानव निर्भरता और शक्ति

मुझे लगता है कि गोल्ड्सवर्दी की चिंताएं तब सबसे अधिक प्रभावशाली लगती हैं जब उन्हें एआई बनाम मानव चेतना के तकनीकी दावों के बजाय मानव निर्भरता, शक्ति और अर्थ के बारे में चेतावनियों के तौर पर देखा जाए।

जिन सामाजिक जोखिमों का वह वर्णन करती हैं, उनके लिए किसी पूर्ण कृत्रिम महाबुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस) की आवश्यकता नहीं है। श्रम व्यवधान (नौकरियों का संकट), शिक्षा पर बढ़ती निर्भरता, कृत्रिम आत्मीयता , भ्रामक जानकारियाँ, सत्ता का केंद्रीकरण और निर्णय लेने की क्षमता का स्वचालन (ऑटोमेशन) पहले से ही गंभीर और ज्वलंत मुद्दे हैं।

गोल्ड्सवर्दी की चिंताएं उसी नैतिक संदर्भ से जुड़ी हैं, जिसमें पोप लियो चौदहवें ने हाल ही में ‘मैग्निफिका ह्यूमानिटास’ के जरिए मानवता के लिए एआई से जुड़े खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। दोनों ही एआई पर चर्चा करते समय मानव गरिमा, सत्य, श्रम, सामाजिक न्याय और इस आवश्यकता पर बल देते हैं कि प्रौद्योगिकी मानवता की सेवा करे, न कि शक्ति के केंद्रीकरण का साधन बने। वे दोनों न केवल इस बात पर सवाल उठाते हैं कि एआई क्या कर सकता है, बल्कि इस बात पर भी कि इसके उभार के बाद इंसान होने की कौन सी धारणा जीवित रह पाएगी।

गोल्ड्सवर्दी एआई के बारे में दूर से बात नहीं करतीं। वह इसे रसोई, कक्षा, परिवार, कार्यस्थल और निजी जिंदगी से जोड़ती हैं। निबंध की शुरुआत में जब वह रात के खाने के लिए अपने बेटे का शुक्रिया अदा करते हुए कहती हैं कि इससे ‘मेरी जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है,’ तो उनका 16 साल का बेटा जवाब देता है, ‘आप बिल्कुल एआई की तरह बोल रही हैं।’

रचनात्मकता, कार्य और साहचर्य

एक संगीतकार और लेखिका होने के नाते गोल्ड्सवर्दी जानती हैं कि कला केवल किसी कलाकृति को रचने के बारे में नहीं है। वह श्रम, ऊब, अभ्यास, सीखने, निराशा, अनुशासन और अनुभव से जन्म लेती है। यहीं मुझे उनका निबंध सबसे अधिक प्रभावशाली लगा।

एआई असाधारण गति से लेख, संगीत, चित्र और डिजाइन तैयार कर सकता है, लेकिन रचनात्मकता में केवल गति ही मूल्य या पैमाना नहीं है। कई बार धीमी और कठिन प्रक्रिया ही उसका सबसे महत्वपूर्ण बात होती है।

एक पियानोवादक केवल पियानो की ध्वनि नहीं चाहता; वह संघर्ष, स्पर्श, अभ्यास की याद और वाद्ययंत्र के साथ अपने जुड़ाव को भी महत्व देता है। इसी तरह, एक लेखक केवल तैयार पैराग्राफ नहीं चाहता; उसे उस सोच-विचार की भी जरूरत हो सकती है जो उसे लिखते समय जूझने के दौरान मिलती है।

निबंध काम के महत्व पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है। गोल्ड्सवर्दी का इस धारणा पर सवाल उठाना बिल्कुल सही है कि हर वह काम जिसका स्वचालन संभव है, उसका स्वचालन किया ही जाना चाहिए। वह गैर-जरूरी या फालतू के कामों से मुक्त होने और अर्थपूर्ण रोजगार से वंचित होने के बीच स्पष्ट अंतर करती हैं।

एआई की हर समस्या का समाधान असंभव नहीं

एक एआई विशेषज्ञ के रूप में, मैं विभिन्न प्रकार की एआई प्रणालियों और जोखिम के अलग-अलग स्तरों के बीच थोड़ा और अंतर देखना पसंद करती। एआई से जुड़ी हर चिंता एक जैसी नहीं है और एआई के बारे में हम जो भी समस्या सुनते हैं, ऐसा नहीं है कि उनमें से हर समस्या का समाधान मुमकिन न हो।

सचमुच परेशान करने वाला

हालांकि, गोल्ड्सवर्दी एआई के जोखिमों का कोई तकनीकी वर्गीकरण नहीं लिख रही हैं। वह एक गहरा और शायद अधिक मुश्किल सवाल पूछ रही हैं: जब मशीनें उन चीजों में माहिर हो जाती हैं, जिन्हें हम कभी सिर्फ इंसानों की खासियत समझते थे, तो इंसानों का क्या होता है? एक चैटबॉट सलाह दे सकता है, खुशामद कर सकता है, नकल कर सकता है और हिसाब-किताब कर सकता है। लेकिन इससे वह इंसान नहीं बन जाता।

इसीलिए यह निबंध सफल है। यह एआई का कोई एकदम सटीक तकनीकी नक्शा नहीं है और न ही इसे ऐसा होने की जरूरत है। यह एक गंभीर, बेहतरीन और सोचने पर मजबूर कर देने वाला निबंध है।

इस निबंध की सबसे बड़ी चेतावनी यह नहीं है कि एआई अमानवीय है। बल्कि यह है कि एआई कहीं हमारा प्रतिबिंब बहुत अधिक सटीकता से न दिखाने लगे।

अंततः गोल्ड्सवर्दी हमारे सामने यही प्रश्न छोड़ती हैं, क्या एआई शक्तिशाली बनेगा? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम इतने बुद्धिमान बन पाएंगे कि अपनी ही बनाई हुई इस शक्ति के साथ जिम्मेदारी से जी सकें?

( द कन्वरसेशन)

शुभम दिलीप

दिलीप