पोर्ट ऑफ स्पेन, 10 मई (भाषा) विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत और त्रिनिदाद एवं टोबैगो के बीच हुआ अभिलेखीय सहयोग समझौता भारतीय मूल के लोगों को अपनी पैतृक जड़ों का पता लगाने और परिवारों से दोबारा जुड़ने में मदद करेगा।
उन्होंने ‘गिरमिटिया’ समुदाय की विरासत को संरक्षित करने के लिए भारत सरकार के प्रयासों का भी उल्लेख किया।
‘गिरमिटिया’ शब्द उन भारतीय बंधुआ मजदूरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें ब्रिटिश शासन ने 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में फिजी, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस और कैरेबियाई देशों में अपने उपनिवेशों में भेजा था।
जयशंकर ने शनिवार को ऐतिहासिक नेल्सन द्वीप पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए 180 वर्ष पहले त्रिनिदाद एवं टोबैगो पहुंचे पहले भारतीय बंधुआ मजदूरों को याद किया और कठिन परिस्थितियों में नया जीवन बसाने में उनके ‘‘साहस, दृढ़ संकल्प और संकल्पशक्ति’’ को नमन भी किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय प्रवासी अपने साथ अपनी परंपराएं, आस्था और जीवन शैली भी लेकर आए थे और इस इतिहास को विरासत स्थल के रूप में संरक्षित किया जाना उपयुक्त है।
विदेश मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘गिरमिटिया’ समुदाय का डाटाबेस तैयार करने और उसकी विरासत पर शोध कराने को अत्यधिक महत्व देते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के निर्देश पर भारत एक समर्पित ‘गिरमिटिया अध्ययन केंद्र’ स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार और त्रिनिदाद एवं टोबैगो के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने उम्मीद जताई कि यह समझौता कैरेबियाई देश के अनेक लोगों को ‘‘अपनी पैतृक जड़ों का पता लगाने और भारत में अपने परिवारों से दोबारा जुड़ने’’ में मदद करेगा।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी यात्रा के दौरान भारतीय मूल के छठी पीढ़ी तक के लोगों को ओवरसीज सिटिजनशिप ऑफ इंडिया (ओसीआई) कार्ड के लिए पात्र बनाने की घोषणा करने के बाद त्रिनिदाद एवं टोबैगो स्थित भारतीय उच्चायोग को ओसीआई कार्ड के लिए बढ़ती संख्या में आवेदन प्राप्त हो रहे हैं।
जयशंकर ने कहा, ‘‘उच्चायोग को प्राप्त होने वाले ओसीआई आवेदनों की संख्या बढ़ रही है और हमारा प्रयास उन लोगों की भी सहायता करना होगा जिनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।’’
विदेश मंत्री ने नेल्सन द्वीप पर सांस्कृतिक विरासत सुविधाओं के उन्नयन के लिए भारत की अनुदान सहायता से संचालित ‘क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट’ की शुरुआत में भी हिस्सा लिया।
इस परियोजना में स्मारक निर्माण, राष्ट्रीय अभिलेखागार के ऐतिहासिक आंकड़ों के लिए डिजिटल केंद्र की स्थापना तथा डिजिटल ऑडियो-विजुअल अनुभव विकसित करना शामिल है।
भारतीय उच्चायोग की वेबसाइट के अनुसार, 1845 से 1917 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप से लगभग 1.43 लाख बंधुआ मजदूर त्रिनिदाद पहुंचे थे। इनमें से अधिकांश प्रवासी उत्तर भारत और बिहार से थे।
जयशंकर ने शनिवार को त्रिनिदाद एवं टोबैगो का अपना दौरा समाप्त किया।
वह जमैका, सूरीनाम और त्रिनिदाद एवं टोबैगो की तीन देशों की यात्रा के अंतिम चरण में पोर्ट ऑफ स्पेन पहुंचे थे। इस यात्रा का उद्देश्य कैरेबियाई देशों के साथ भारत की भागीदारी को और मजबूत करना था।
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