( निकोल डेली, वाइकाटो विश्वविद्यालय )
ऑकलैंड, एक सितंबर (द कन्वरसेशन) शोध से यह बात अच्छी तरह सामने आई है कि बच्चों की चित्र वाली पुस्तकें भाषा सीखने में मदद करती हैं।
म्यूनिख स्थित ‘इंटरनेशनल यूथ लाइब्रेरी’ में एक शोधवृत्ति के दौरान मुझे यह अध्ययन करने का अवसर मिला कि चित्र वाली बहुभाषी पुस्तकों में अलग-अलग भाषाओं को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है और उनका इस्तेमाल किसी समाज में उन भाषाओं की बदलती स्थिति को किस तरह प्रतिबिंबित कर सकता है।
न्यूजीलैंड के संदर्भ में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1970 के दशक से बच्चों की चित्र वाली पुस्तकों में ‘ते रेओ माओरी’ (माओरी लोगों की पारंपरिक और आधिकारिक भाषा) के इस्तेमाल में लगातार वृद्धि हुई है। यह भाषा को फिर से उसका स्थान दिलाने और उसके पुनर्जीवन की प्रक्रिया को दर्शाता है। मेरा मानना है कि चित्र वाली पुस्तकें भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
‘यूथ लाइब्रेरी’ में अपने अध्ययन के दौरान मैंने चित्र वाली जिन पुस्तकों का विश्लेषण किया, उनमें एक ही पुस्तक में 11 तक भाषाएं शामिल थीं। ये पुस्तकें दक्षिण अफ्रीका, पोलैंड और नॉर्वे समेत कई देशों की थीं।
मैंने गौर किया कि इन पुस्तकों में आमतौर पर उन भाषाओं को पहले स्थान पर रखा गया, जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या अधिक थी। इसके बाद भाषाओं का क्रम भी अक्सर संबंधित देश में उनके बोलने वालों की संख्या के आधार पर तय किया गया। इस तरह, कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को कम जगह देकर और तवज्जो न देकर ये चित्र वाली पुस्तकें समाज में भाषाओं की मौजूदा स्थिति को ही प्रतिबिंबित कर रही थीं।
न्यूजीलैंड की माओरी और अंग्रेजी भाषाओं वाली चित्रात्मक पुस्तकों में दोनों भाषाओं को प्रस्तुत करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए गए हैं। इससे पता चलता है कि चित्र वाली पुस्तकों का इस्तेमाल भाषाओं के प्रति बदलती सोच को बढ़ावा देने के लिए भी किया जा सकता है।
ते रेओ माओरी का बढ़ता इस्तेमाल
वर्ष 1970 के बाद से एओटेरोआ में प्रकाशित और बाजार में उपलब्ध चित्र वाली पुस्तकों में ‘ते रेओ माओरी’ का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है। पिछले 50 वर्षों में इन पुस्तकों में ‘ते रेओ माओरी’ और अंग्रेजी को दिए जाने वाले स्थान में भी बदलाव आया है। यह बदलाव दोनों भाषाओं की बदलती सामाजिक स्थिति को भी दर्शाता है।
वर्ष 1973 में, जब एओटेरोआ में ‘ते रेओ माओरी’ को आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं मिला था, तब जिल बैगनॉल की लिखी ‘बारबरा स्ट्रैथडी’ द्वारा चित्रित तथा हापी पोताए द्वारा अनुवादित ‘क्रेफिशिंग विद ग्रैंडमदर’ प्रकाशित हुई।
पुस्तक के मुखपृष्ठ पर केवल अंग्रेजी शीर्षक है। इसलिए पहली नजर में यह एकभाषी पुस्तक लगती है। लेकिन पुस्तक के भीतर हर पृष्ठ पर ‘माओरी’ भाषा में भी पाठ दिया गया है। माओरी पाठ को अंग्रेजी के नीचे रखा गया है, लेकिन उसके अक्षरों का आकार और मोटाई अंग्रेजी पाठ के अक्षरों के बराबर है।
अंग्रेजी पाठ के बीच माओरी के कुछ शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया है। पाठकों की समझ में मदद के लिए पुस्तक के अंत में शब्दावली दी गई है। हालांकि पृष्ठ पर माओरी पाठ को अंग्रेजी के नीचे रखा गया था, लेकिन उस दौर के एओटेरोआ में अंग्रेजी के साथ माओरी को जगह देना अपने आप में एक महत्वपूर्ण कदम था। यह द्विभाषी भविष्य के समर्थन का एक स्पष्ट संकेत था।
इसके कुछ साल बाद, 1976 में ‘पुकुनुई’ प्रकाशित हुई। इसे जेम्स वाएरिआ (नगाती कहुंगुनु, ते अरावा) ने लिखा और चित्रित किया था। इसमें भी अंग्रेजी मुख्य भाषा थी, लेकिन चित्रों में दिखाई देने वाले पात्र संवाद-पटलों में ‘ते रेओ माओरी’ बोलते हैं। जिन पाठकों को ‘ते रेओ माओरी’ की जानकारी नहीं थी, उनकी मदद के लिए वाएरिआ ने ‘माओरी’ वाक्यांशों की शब्दावली दी और उनके अंग्रेजी अर्थ भी बताए।
घर में पढ़ने की ओर बढ़ता कदम
नई सदी के साथ न्यूजीलैंड में अंग्रेजी बोलने वाले माता-पिता के लिए ऐसी द्विभाषी चित्र वाली पुस्तकों की संख्या भी बढ़ी, जिनका इस्तेमाल वे घर पर बच्चों के साथ कर सकते थे।
‘कानोही माई फेस’ (रेओ पेपी, 2015) को चचेरी बहनों किटी ब्राउन (नगाई ताहु, नगाती मामोए, वैताहा) और कर्स्टन पार्किंसन (नगाई ताहु, नगाती काहुंगुनु की ते वाइरोआ) ने तैयार किया। दोनों अपने बच्चों के साथ घर पर ‘ते रेओ माओरी’ का इस्तेमाल करना चाहती थीं, लेकिन बाजार में शिशुओं के लिए ऐसी किताबें नहीं मिल रही थीं, जो इस भाषा के इस्तेमाल में उनकी मदद कर सकें।
इस पुस्तक की प्रस्तुति से साफ पता चलता है कि इसका उद्देश्य पाठकों को ‘ते रेओ माओरी’ सीखने में मदद करना था। हर पृष्ठ पर ‘माओरी’ पाठ को पहले रखा गया है और उसका अक्षर आकार अंग्रेजी से बड़ा तथा मोटा है। अंग्रेजी पाठ उसके बाद आता है।
भाषाओं के प्रति बदलती सोच की झलक
बहुभाषी बच्चों की चित्र वाली पुस्तकों में भाषाओं को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है, यह अक्सर भाषा के बारे में समाज की सोच और मान्यताओं को दर्शाता है।
लेकिन भाषाओं की प्रस्तुति केवल समाज में मौजूद सोच को प्रतिबिंबित ही नहीं करती, बल्कि उसे बदलने की क्षमता भी रखती है। ऐसी पुस्तकें बच्चों और वयस्कों, दोनों को परिचित और अपरिचित भाषाओं से रूबरू कराती हैं और इस तरह भाषाओं के प्रति उनकी सोच को प्रभावित कर सकती हैं।
आज की एओटेरोआ न्यूजीलैंड की कई चित्र-पुस्तकों की एक खास बात यह है कि उनमें माओरी के शब्दों और वाक्यांशों के साथ अलग से शब्दावली नहीं दी जाती। इसके पीछे यह मान्यता है कि अब बहुत से पाठक माओरी के कम से कम कुछ शब्द समझते हैं।
जिन पाठकों को अभी भी मदद की जरूरत होती है, उनके लिए कहानी का संदर्भ और चित्र अर्थ समझने और भाषा सीखने में मदद करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे कोई पाठक अंग्रेजी के किसी अपरिचित शब्द को उसके संदर्भ और चित्र के सहारे समझता है।
इस तरह की चित्र वाली पुस्तकें ‘ते रेओ माओरी’ के प्रति अधिक समावेशी सोच को दर्शाने के साथ-साथ उसे मजबूत भी करती हैं। हम भाषा का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, यह हमारी पहचान को दर्शाता है। इसी तरह हमारी चित्र वाली पुस्तकें उन भाषाओं का स्थायी दस्तावेज बन जाती हैं, जिन्हें हम आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहते हैं।
द कन्वरसेशन खारी मनीषा
मनीषा