क्या हंसी ने इंसानों को बोलना सिखाया? शोध में मिले भाषा के विकास से जुड़े अहम संकेत

Ads

क्या हंसी ने इंसानों को बोलना सिखाया? शोध में मिले भाषा के विकास से जुड़े अहम संकेत

  •  
  • Publish Date - July 27, 2026 / 04:23 PM IST,
    Updated On - July 27, 2026 / 04:23 PM IST

(चियारा डी ग्रेगोरियो, वारविक विश्वविद्यालय)

कॉनवेंट्री, 27 जुलाई (द कन्वरसेशन) मनुष्य ही अकेला ऐसा जीव नहीं है जो आपस में संवाद करता हो। पक्षी साथी को आकर्षित करने के लिए गीत गाते हैं, डॉल्फिन एक-दूसरे की पहचान के लिए विशिष्ट सीटी जैसी आवाजें निकालती हैं और कई वानर प्रजातियां जटिल ध्वनियों के माध्यम से अपने सामाजिक संबंधों का समन्वय करते हैं।

इन संचार प्रणालियों का अध्ययन करके वैज्ञानिक उन विकासवादी चरणों को समझने की कोशिश करते हैं, जिनके परिणामस्वरूप मनुष्य की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक ‘भाषा’ का उद्गम हुआ।

भाषा केवल आवाज निकालने का नाम नहीं है। इसके लिए ध्वनियों पर असाधारण नियंत्रण की आवश्यकता होती है। मनुष्य के बोलने की प्रक्रिया में सांस, स्वरयंत्र में स्थित स्वर-रज्जुओं तथा जीभ, होंठ और जबड़े के बीच बेहद सटीक तालमेल जरूरी होता है।

मनुष्य के सबसे निकट जीव चिम्पांजी और बोनोबो का स्वर तंत्र वैज्ञानिकों की पहले की धारणा से कहीं अधिक हद तक मनुष्य जैसा है। इसके बावजूद उनमें होंठों और जीभ जैसी संरचनाओं पर वैसा सूक्ष्म और स्वैच्छिक नियंत्रण नहीं दिखता, जो मनुष्य को तेजी से लगातार बोलने और तरह-तरह की ध्वनियां निकालने में सक्षम बनाता है।

यहीं से एक दिलचस्प सवाल मन में आता है-आखिर हमारे पूर्वजों ने ध्वनियों पर यह असाधारण नियंत्रण कब हासिल करना शुरू किया? इसका एक संभावित साक्ष्य एक अप्रत्याशित स्रोत ‘हंसी’ से मिलता है।

हंसी का विकास

पिछले कई वर्षों से मैं वानर प्रजातियां की ध्वनियों की लयात्मक संरचना का अध्ययन कर रहा हूं। मेरा ध्यान इस बात पर नहीं रहा कि वे ध्वनियां क्या अर्थ व्यक्त करती हैं, बल्कि इस पर रहा कि वे पैदा कैसे होती हैं।

ध्वनियों की लय यह बताती है कि सांस लेने और आवाज निकालने की प्रक्रिया में किस तरह तालमेल बैठता है। इससे उन जैविक तंत्रों को समझने में मदद मिलती है, जो इन ध्वनियों का निर्माण करते हैं। चाहे मेडागास्कर के इंद्री लीमर के गीतों का अध्ययन हो या ओरंगुटान की आवाजों का, मेरे सामने बार-बार एक ही सवाल आता रहा है कि अलग-अलग वानर प्रजातियां अपनी आवाज की लय पर कितना नियंत्रण रखती हैं?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हंसी सबसे उपयुक्त माध्यम साबित हुई।

बोलने की क्षमता के विपरीत, हंसने की क्षमता सभी वानरों (ग्रेट एप्स) में पाई जाती है। चिम्पांजी, बोनोबो, गोरिल्ला और ओरंगुटान खेलते समय हंसी जैसी आवाजें निकालते हैं। हालांकि ये हमारी परिचित ‘‘हा…हा…हा’’ जैसी नहीं सुनाई देतीं, लेकिन इनका सामाजिक उद्देश्य लगभग वही होता है। ये खेलभावना का संकेत देती हैं और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करती हैं।

हालांकि, मनुष्य की हंसी कहीं अधिक विविध होती है। हम कभी ठहाका लगाते हैं, कभी धीमे से मुस्कराते या खिलखिलाते हैं, कभी नाक से हंसी की आवाज निकालते हैं और कभी लगभग बिना आवाज के भी हंसते हैं। हम केवल खुशी में ही नहीं, बल्कि शर्मिंदगी, घबराहट या सामाजिक असहजता कम करने के लिए भी हंसते हैं। यही लचीलापन मनुष्य की हंसी को केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया से कहीं अधिक बना देता है।

मनुष्य की हंसी पूरी तरह परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जब हम सचमुच प्रसन्न होते हैं, औपचारिक सामाजिक व्यवहार निभा रहे होते हैं, असहज महसूस कर रहे होते हैं या किसी व्यक्तिगत मजाक को साझा कर रहे होते हैं, तब हमारी हंसी का अंदाज अलग-अलग होता है।

अपने सहयोगियों के साथ हमने मनुष्यों और अन्य चार वानर प्रजातियों की हंसी के 140 प्रकार के ठहाकों का विश्लेषण किया। हमारा उद्देश्य यह जानना नहीं था कि उनकी हंसी एक जैसी सुनाई देती है या नहीं, बल्कि यह देखना था कि उसकी लय कैसी है—एक हंसी के बाद दूसरी कितनी तेजी से आती है और यह क्रम कितना नियमित रहता है।

परिणामों में एक स्पष्ट विकासवादी पैटर्न सामने आया।

हंसते समय मनुष्यों की लय अपने निकटतम संबंधियों की तुलना में कहीं अधिक विविध होती है। चिम्पांजी और बोनोबो अपेक्षाकृत धीमी गति से हंसते हैं, जबकि गोरिल्ला और ओरंगुटान की हंसी की गति इससे भी धीमी होती है।

इसके विपरीत, मनुष्य की हंसी में ध्वनियां कहीं अधिक तेजी से और लगातार दोहराई जाती हैं। यह बढ़ा हुआ लचीलापन संभवतः उन विकासवादी परिवर्तनों में से एक है, जिसने ध्वनियों पर मनुष्य का सूक्ष्म और स्वैच्छिक नियंत्रण विकसित करने में भूमिका निभाई।

दूसरे शब्दों में कहें तो, मनुष्य की तेजी से हंसने की क्षमता शायद उन अहम विकासवादी नवाचारों में से एक है, जिसने आगे चलकर बोलने की क्षमता का मार्ग प्रशस्त किया।

हंसी और भाषा का संबंध

संभव है कि भाषा का विकास केवल नयी ध्वनियां पैदा करने से नहीं हुआ, बल्कि ध्वनियां निकालने की पूरी गति और लय बदलने से हुआ हो। हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि इस महत्वपूर्ण विकासवादी बदलाव के निशान आज भी हमारी सबसे सामान्य गतिविधियों में से एक ‘हंसने’ में मौजूद हैं।

हालांकि मनुष्य और चिम्पांजी का विकासवादी इतिहास साझा है, लेकिन हम कभी यह नहीं जान पाएंगे कि हमारे प्राचीन पूर्वज किस तरह हंसते थे। जीवाश्म केवल हड्डियों को सुरक्षित रखते हैं, आवाजों को नहीं। इसलिए हंसी के विकास को समझने का एकमात्र तरीका जीवित प्रजातियों की तुलना करना और यह अनुमान लगाना है कि मानव वंश में समय के साथ कौन-कौन से बदलाव हुए।

चूंकि हमने पाया कि चिम्पांजी और बोनोबो की हंसी अपनी लय और समयगत विविधता के लिहाज से मनुष्य की हंसी से अलग है, इसलिए इन जीवित प्रजातियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शुरुआती मानव की हंसी भी अन्य वानरों से अलग हो चुकी थी और वह आधुनिक मानव की हंसी की दिशा में विकसित हो रही थी।

संभव है कि 30 से 40 लाख वर्ष पहले ही शुरुआती मानव वंश में आज के मनुष्यों जैसी विविध हंसी की कुछ बुनियादी विशेषताएं विकसित हो चुकी थीं। हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि हंसी की समयगत विविधता मानव वंश के विकासक्रम में धीरे-धीरे बढ़ी। इससे हंसी अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप ढलती गई—चाहे वह खेल-खेल में होने वाली बातचीत हो, सामाजिक संबंधों को मजबूत करना हो या अपनेपन का संकेत देना।

जब भी हम अपनी तुलना अपने सबसे निकट संबंधी वानरों से करते हैं, तो पता चलता है कि मनुष्य और अन्य वानरों के बीच का अंतर उतना बड़ा नहीं है, जितना कभी माना जाता था। लेकिन साथ ही कुछ ऐसे सूक्ष्म अंतर भी सामने आते हैं, जिनके विकासवादी परिणाम बेहद गहरे रहे होंगे।

हंसी ऐसा ही एक अंतर है। यह भले ही खुशी की एक साधारण अभिव्यक्ति लगे, लेकिन इसकी लय में लाखों वर्षों के विकास का इतिहास छिपा है-और शायद यही उन सुरागों में से एक है, जो बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने आखिरकार बोलना कैसे सीखा।

द कन्वरसेशन खारी नरेश

नरेश