(अमीन शरीफिफार, सिडनी विश्वविद्यालय में मिट्टी सुरक्षा विभाग में प्रॉक्टोरल शोधार्थी )
सिडनी, 28 मई (द कन्वरसेशन) एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि स्वस्थ मिट्टी भीषण गर्मी के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के बड़े हिस्सों में मिट्टी अपनी यह प्राकृतिक क्षमता खोती जा रही है जिससे कृषि उत्पादन, पौधों की वृद्धि और स्थानीय जलवायु पर असर पड़ सकता है।
अध्ययन के अनुसार, अच्छी स्थिति वाली मिट्टी तापमान को नियंत्रित करने वाले ‘‘थर्मल बफर’’ की तरह काम करती है। यह पानी और जैविक पदार्थों जैसे पत्तियों के अवशेष को सहेज कर रखती है तथा तापमान में अचानक होने वाले बदलावों को धीमा करती है।
शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना ऐसे पक्के मकान से की है, जो बाहर 40 डिग्री सेल्सियस तापमान होने पर भी भीतर अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता है। इसके विपरीत, क्षतिग्रस्त या सूखी मिट्टी टीन की छत वाले शेड की तरह तेजी से गर्म हो जाती है।
अध्ययन में कहा गया है कि जब मिट्टी सूखी, बंजर या खराब हो जाती है तो उसकी ताप संतुलन क्षमता कमजोर पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में लू के दौरान फसलों की जड़ें तेजी से गर्म होती मिट्टी के संपर्क में आ जाती हैं, जिससे पौधों पर दबाव बढ़ता है और उत्पादन घट सकता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि उनके अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों, विशेषकर दक्षिण-पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में ‘‘थर्मल गैप’’ पाए गए हैं। ‘‘थर्मल गैप’’ से आशय मिट्टी की प्राकृतिक ताप अवशोषण क्षमता और वर्तमान स्थिति के बीच के अंतर से है, जो वर्षों की खेती, भूमि उपयोग में बदलाव और जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुआ है।
अध्ययन के अनुसार, मिट्टी केवल जमीन की सतह नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को नियंत्रित करने वाली एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रणाली भी है। मिट्टी ही यह निर्धारित करती है कि भूमि और वातावरण के बीच गर्मी तथा नमी का आदान-प्रदान किस प्रकार होगा। जब मिट्टी अपनी तापीय संतुलन क्षमता खो देती है, तब जमीन का तापमान तेजी से बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने पहली बार पूरे ऑस्ट्रेलिया की मिट्टी की तापीय संतुलन क्षमता का मानचित्र तैयार किया। इसमें विभिन्न प्रकार की मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता और वर्तमान स्थिति की तुलना की गई।
अध्ययन में पाया गया कि चिकनी मिट्टी (क्ले युक्त मिट्टी) अधिक पानी रोकने में सक्षम होती है और धीरे-धीरे गर्म तथा ठंडी होती है। इससे पौधों की जड़ों के आसपास तापमान अपेक्षाकृत स्थिर बना रहता है।
उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में पाई जाने वाली लौह तत्वों से भरपूर लाल और पीली मिट्टी, जिन्हें ‘‘कैंडोसल’’ कहा जाता है, ने भी अध्ययन में अच्छी ताप संतुलन क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं के अनुसार, मिट्टी की वास्तविक स्थिति, नमी, भूमि आवरण और प्रबंधन पद्धतियां अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसके विपरीत, रेतीली मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता कम होती है। भूमि पर वनस्पति आवरण कम होने पर ऐसी मिट्टी तेजी से नमी खो देती है और धूप में बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। इससे पौधों को कम सुरक्षा मिलती है।
अध्ययन में ‘‘अचानक सूखा पड़ने’’ को भी बेहद खतरनाक बताया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब अत्यधिक तापमान, शुष्क हवाएं और मिट्टी में नमी की कमी एक साथ होती है, तब कुछ ही दिनों या हफ्तों में अचानक सूखा पड़ सकता है।
एक वैश्विक अध्ययन का हवाला देते हुए शोधकर्ताओं ने कहा कि अत्यधिक गर्मी से जुड़ा सूखा, सामान्य सूखे की तुलना में अधिक गंभीर होता है और इससे उबरने में अधिक समय लगता है। किसानों के लिए समस्या अक्सर जमीन की सतह पर दिखाई देने से पहले मिट्टी के भीतर शुरू हो जाती है।
हालांकि, अध्ययन में यह भी कहा गया है कि व्यावहारिक कृषि उपायों के जरिए मिट्टी की ताप सुरक्षा क्षमता को दोबारा बेहतर बनाया जा सकता है।
इन उपायों में फसल कटाई के बाद खेत में फसल अवशेष छोड़ना, जिसे ‘‘स्टबल रिटेंशन’’ कहा जाता है, शामिल है। इससे मिट्टी को छाया मिलती है और पानी का वाष्पीकरण धीमा होता है।
दूसरा तरीका ‘‘कवर क्रॉपिंग’’ है, जिसमें मिट्टी की सुरक्षा और पोषण के लिए विशेष पौधे उगाए जाते हैं। इससे मिट्टी खुली नहीं रहती, जड़ों की मौजूदगी बनी रहती है और जैविक पदार्थ बढ़ते हैं।
विदेशों में हुए अध्ययनों का हवाला देते हुए शोधकर्ताओं ने कहा कि जिन खेतों में पौधों का आवरण बना रहता है, वहां मिट्टी अधिक नमी बनाए रखती है और सतह का तापमान भी कम रहता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये उपाय लू को समाप्त नहीं कर सकते, लेकिन मिट्टी और फसलों पर गर्मी के प्रभाव को कम कर सकते हैं। ठंडी और नम मिट्टी आसपास की वनस्पतियों को भी धीरे-धीरे सूखने देती है, जिससे जंगल की आग के जोखिम को कम करने में आंशिक मदद मिल सकती है।
अध्ययन में कहा गया है कि अगला कदम खेतों में स्थानीय सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली विकसित करना है। इसके तहत मिट्टी के भीतर तापमान और नमी मापने वाले उपकरण लगाए जा सकते हैं, जो यह बताएंगे कि मिट्टी कितनी तेजी से गर्म हो रही है और पौधों की जड़ों पर कब दबाव बढ़ रहा है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि इस तरह की जानकारी के आधार पर किसानों के लिए खेत-स्तरीय मानचित्र, गर्मी जोखिम चेतावनी और सिंचाई संबंधी दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकते हैं।
अध्ययन के अनुसार, भविष्य में केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि ‘‘मिट्टी कितनी सूखी है’’ बल्कि यह भी समझना होगा कि ‘‘सूखने के बाद मिट्टी कितनी तेजी से गर्म होगी।’’
शोधकर्ताओं ने कहा कि यदि किसान जमीन के भीतर बढ़ते ताप दबाव को समय रहते समझ सकें तो वे सिंचाई, चराई, फसल कटाई और भूमि प्रबंधन से जुड़े फैसले पहले ही ले सकेंगे।
अध्ययन में कहा गया है कि स्वस्थ मिट्टी जल को संरक्षित करती है, तापमान को नियंत्रित करती है और पौधों की जड़ों की रक्षा करती है, जबकि क्षतिग्रस्त मिट्टी यह सुरक्षा खो देती है।
अध्ययन के अनुसार, ‘‘थर्मल गैप’’ को समझकर और कम करके कृषि भूमि, ग्रामीण समुदायों और प्राकृतिक परिदृश्यों को अधिक गर्म और शुष्क भविष्य से बेहतर तरीके से बचाया जा सकता है।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश