इंडियन ओवरसीज कांग्रेस ने आरएसएस प्रमुख भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर चिंता जताई

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इंडियन ओवरसीज कांग्रेस ने आरएसएस प्रमुख भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर चिंता जताई

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  • Publish Date - August 26, 2026 / 06:44 PM IST,
    Updated On - August 26, 2026 / 06:44 PM IST

न्यूयार्क, 26 अगस्त (भाषा) इंडियन ओवरसीज कांग्रेस ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर चिंता जताते हुए सवाल उठाया है कि आरएसएस अमेरिकी लोगों के सामने खुद को “वैश्विक एकता” और “सभ्यतागत संवाद” को बढ़ावा देने वाले सांस्कृतिक संगठन के रूप में पेश करने का प्रयास क्यों कर रहा है।

इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अमेरिकी चैप्टर (आईओसीयूएसए) ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रतिनिधियों से संपर्क करने वाले अमेरिकी राजनीतिक, कारोबारी, धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को संगठन के ‘‘इतिहास, विचारधारा और राजनीतिक प्रभावों” को समझना चाहिए।

इसने ‘‘धार्मिक राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों के अधिकारों’’ को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि आरएसएस के विदेशों में दिए जाने वाले संदेशों को उसके ‘‘ऐतिहासिक वैचारिक रिकॉर्ड’’ के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

आरएसएस के शताब्दी वर्ष के वैश्विक जनसंपर्क कार्यक्रम के तहत मंगलवार को अमेरिका पहुंचे भागवत 29 अगस्त को प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन (एमएसजी) में लगभग 5,000 लोगों की एक सभा को संबोधित करेंगे।

आरएसएस ने कहा है कि भागवत की विदेश यात्रा के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं— भारत, हिंदू समाज और संगठन के बारे में तथ्यपरक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना; “वसुधैव कुटुंबकम्” का संदेश देना; और हिंदुओं तथा भारतीय मूल के लोगों के हितों एवं अधिकारों को लेकर मुख्यधारा के समाज के साथ संवाद बढ़ाना।

आईओसीयूएसए ने बयान में कहा कि आरएसएस का आकलन केवल विदेशों में चलाए जा रहे जनसंपर्क अभियान के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के आधार पर नहीं किया जा सकता।

इसने तर्क दिया कि आरएसएस के वैचारिक रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

आईओसीयूएसए ने कहा, ‘‘दुनिया की महान और प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक हिंदू धर्म को हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।’’

आईओसीयूएसए के बयान में कहा गया है, ‘‘भारत और दुनियाभर में लाखों हिंदू बहुलतावाद, लोकतंत्र और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं। हमारी आलोचना हिंदू धर्म या हिंदुओं के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ है।’’

इसने इस बात को रेखांकित किया कि मानवाधिकार संगठनों, धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली संस्थाओं, पत्रकारों और नागरिक समाज संगठनों ने भारत में अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाले भेदभाव, घृणास्पद भाषण और हिंसा को लेकर चिंता जताई है।

इसने यह भी कहा कि जब अल्पसंख्यक इस डर के साथ रह रहे हों कि उनके धर्म, संस्कृति या देशभक्ति पर लगातार सवाल उठाए जाएंगे, तब ‘‘राष्ट्रीय एकता का कोई विश्वसनीय संदेश’’ नहीं दिया जा सकता।

आईओसीयूएसए ने कहा, ‘‘किसी व्यक्ति को नागरिक होने के नाते कितना सम्मान या महत्व मिलेगा, यह अगर उसके धर्म के आधार पर तय किया जाये तो उसे वास्तविक लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता।’’

भाषा

देवेंद्र माधव

माधव