काठमांडू, एक सितंबर (भाषा)नेपाल ने हाल ही में अचानक आई जानलेवा बाढ़ से हुई तबाही के लिए हरित गैस उत्सर्जक देशों से जलवायु-संबंधी मुआवजा पाने के लिए कूटनीतिक कोशिशें शुरू की हैं। नेपाल का कहना है कि आपदा के बाद दी जाने वाली मदद को “नैतिक जिम्मेदारी” माना जाना चाहिए, न कि “दान”।
विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि हरित गैस उत्सर्जन में “लगभग न के बराबर” योगदान देने के बावजूद, नेपाल वैश्विक तापमान के बहुत ज्यादा बुरे नतीजों का सामना कर रहा है जिनमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पहाड़ों पर होने वाली भयंकर आपदाएं शामिल हैं।
उन्होंने कांतिपुर टीवी को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “हम एक ऐसे वैश्विक संकट की भारी कीमत चुका रहे हैं जिसे हमने पैदा नहीं किया है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पहाड़ों में आने वाली ये विनाशकारी सुनामी, वैश्विक जलवायु परिवर्तन का सीधा नतीजा हैं।” इस साक्षात्कार के कुछ अंश मंगलवार को ‘द काठमांडू पोस्ट’ अखबार में प्रकाशित हुए थे।
खनाल ने कहा कि नेपाल अपने कूटनीतिक ढांचे को “मदद” से बदलकर “न्याय और मुआवजे” की ओर ले जा रहा है।
उन्होंने कहा, “यह दान-पुण्य का मामला नहीं है; यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी का मामला है।”
खनाल ने कहा कि नेपाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा “पूरी दृढ़ता और स्पष्टता” के साथ उठाएगा और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को हुए नुकसान के लिए सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देशों से मुआवजे की मांग करेगा।
उन्होंने कहा, “यह सभ्यता के अस्तित्व का मामला है। अगर हमारे हिमालयी ग्लेशियर खत्म हो जाते हैं, तो दक्षिण एशिया के दो अरब से ज्यादा लोगों की पानी की सुरक्षा हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी, जो गंगा और त्रिशूली जैसी नदियों पर निर्भर हैं। हम सिर्फ नेपाल के लिए ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई सभ्यता के अस्तित्व के लिए भी आवाज उठा रहे हैं।”
खनाल ने कहा कि वित्त मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को जलवायु मुआवजे के दावे का पत्र भेजा है।
मंत्री ने चीन, अमेरिका और भारत को दुनिया में हरित गैस का उत्सर्जन करने वाले तीन सबसे बड़े देशों के तौर पर पहचाना और कहा कि “नेपाल जैसे कमजोर देशों को मुआवजा देने की उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है”।
भारत ने बार-बार जलवायु समानता पर जोर दिया है और प्रति व्यक्ति कम उत्सर्जन के अपने आंकड़े को रेखांकित किया है। भारत का तर्क है कि जलवायु संबंधी जिम्मेदारियों को तय करते समय देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और क्षमताओं में अंतर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भारत का मानना है कि पश्चिमी देशों ने, जहां सबसे पहले औद्योगीकरण हुआ, वैश्विक कार्बन बजट का ज्यादातर हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है।
अखबार ‘द काठमांडू पोस्ट’ की खबर के अनुसार, 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी घाटी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ के बाद, नेपाल ने ‘लॉस एंड डैमेज’ से निपटने वाली निधि के बोर्ड से औपचारिक रूप से तत्काल वित्तीय सहायता मांगी है।
यह तंत्र 2022 में सीओपी27 में स्थापित किया गया था और सीओपी28 में इसे लागू किया गया।
वन मंत्रालय के संयुक्त सचिव और ‘लॉस एंड डैमेज’ निधि बोर्ड के सदस्य महेश्वर ढकाल ने कहा कि यह पहली बार है जब नेपाल ने इस व्यवस्था से मदद मांगी है।
भाषा प्रशांत नरेश
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