जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्म हो रहे हिमालय में नेपाल जैसी बाढ़ की घटनाएं बढ़ रहीं

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जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्म हो रहे हिमालय में नेपाल जैसी बाढ़ की घटनाएं बढ़ रहीं

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  • Publish Date - September 2, 2026 / 11:45 AM IST,
    Updated On - September 2, 2026 / 11:45 AM IST

काठमांडू, दो सितंबर (एपी) नेपाल के एक सुदूर गांव में पिछले सप्ताह जब पानी, चट्टानों और कीचड़ का सैलाब आया तो पेमा तामांग और उनके पड़ोसी पहाड़ी पर स्थित एक बौद्ध स्तूप की ओर भागे। इस स्तूप का 2015 के भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के बाद पिछले साल ही पुनर्निर्माण किया गया था।

भूकंप की आशंका वाले हिमालय के ऊंचे पर्वतीय इलाकों में पहाड़ी ग्लेशियरों के पिघलने के साथ अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाएं अधिक लगातार हो रही हैं। इससे नदियों का स्वरूप कई बार बेहद तेजी से और भयावह तरीके से बदल रहा है। लोगों को एक आपदा के बाद दूसरी आपदा से उबरने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है, जिससे यह चिंता बढ़ रही है कि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बढ़ने के साथ ये समुदाय कब तक टिक पाएंगे।

तामांग ने काठमांडू में एक मठ में बनाए गए अस्थायी आश्रय में ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ से कहा, ‘‘भूकंप में नष्ट होने के बाद हमने पिछले साल ही स्तूप का पुनर्निर्माण किया था। बाढ़ से अपनी जान बचाने के लिए हमने उसी में शरण ली।’’

नेपाल और पड़ोसी चीन में 26 अगस्त को आई बाढ़ में 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है और हजारों लोग लापता हैं। इनमें से कई लोगों के जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। कई हिमालयी नदियों में यह बाढ़ तब आई जब चट्टानों और ग्लेशियर की बर्फ का एक हिस्सा ढह गया और मलबे तथा पानी का तेज बहाव नदियों में आ गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस आपदा को सीधे तौर पर वैश्विक तापमान वृद्धि से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि, तेल, गैस और कोयले के इस्तेमाल से पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इससे ऐसी आपदाओं की संभावना भी बढ़ रही है। हिमालय में यह खतरा और अधिक है क्योंकि यह क्षेत्र दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तुलना में काफी तेजी से गर्म हो रहा है।

काठमांडू स्थित ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ के आपदा जोखिम विशेषज्ञ शाश्वत सान्याल ने कहा, ‘‘हिंदूकुश हिमालय में जलवायु परिवर्तन बड़ी भूमिका निभा रहा है और इस तरह की जटिल आपदाओं को बढ़ावा दे रहा है, जिनका असर निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों और निवेश पर पड़ रहा है।’’

सान्याल ने कहा कि यह क्षेत्र ऐसे खतरों का लगातार सामना कर रहा है जो एक-दूसरे को जन्म देते हैं।

बढ़ते तापमान के कारण ऊंचे पर्वतीय इलाकों में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे चट्टानें खिसकने, हिमस्खलन और बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। हिमस्खलन से नदी का रास्ता रुक सकता है और बाद में अचानक बाढ़ आ सकती है। शुरुआती आपदा के बाद भारी बारिश स्थिति को और गंभीर बना सकती है।

इसी क्षेत्र में पिछले साल अचानक आई बाढ़ में नौ लोगों की मौत हुई थी और लाखों डॉलर का नुकसान हुआ था। व्यापक हिमालयी क्षेत्र में 2013 की केदारनाथ बाढ़, 2021 की चमोली आपदा, 2023 में दक्षिण ल्होनक झील के फटने से आई बाढ़ और हाल की अन्य भूस्खलन एवं बाढ़ की घटनाओं में हजारों लोगों की जान गई और सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ।

सान्याल ने कहा कि नेपाल के लोग पिछले साल की बाढ़ से अभी उबर ही रहे थे कि अगली आपदा आ गई।

हिंदूकुश हिमालय अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमा और चीन के कुछ हिस्सों तक फैला है। ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया में बर्फ का सबसे बड़ा भंडार इसी क्षेत्र में है। इन पहाड़ों से निकलने वाली नदी प्रणालियां करीब दो अरब लोगों की जरूरतें पूरी करती हैं।

सान्याल के अंतर-सरकारी जलवायु अनुसंधान समूह के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से ग्लेशियरों के पिघलने की गति काफी तेज हुई है। एक अन्य खतरा स्थायी रूप से जमी जमीन यानी पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने का है, जिससे पहाड़ों की ढलान कमजोर हो सकती है।

पिछले सप्ताह ग्लेशियर के ढहने की उपग्रह तस्वीरों से पता चलता है कि चट्टानों और ग्लेशियर की बर्फ का एक विशाल हिस्सा नीचे घाटी में जा गिरा, जिससे कई किलोमीटर दूर तक बसे समुदायों को बाढ़ की तबाही ने अपनी गिरफ्त में ले लिया।

जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ स्थानों पर खतरा इतना अधिक हो सकता है कि वहां दोबारा निर्माण करना व्यावहारिक नहीं रह जाएगा और लोगों को दूसरी जगह बसना पड़ सकता है।

जलवायु परिवर्तन का असर सड़कों, पुलों और जलविद्युत संयंत्रों के निर्माण के जरिए क्षेत्र के विकास की कोशिशों पर भी पड़ सकता है।

नेपाल के जलवायु नीति विशेषज्ञ और संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वार्ताकार मनजीत ढकाल ने कहा, ‘‘कुछ इलाकों में अनुकूलन की सीमा पार हो चुकी है।’’

उन्होंने कहा कि भूकंप में घर नष्ट होने पर कभी-कभी सामान बचाया जा सकता है, लेकिन विनाशकारी बाढ़ न केवल घर बल्कि उसके नीचे की जमीन, सड़कें, जलापूर्ति व्यवस्था, स्कूल और बिजली की सुविधाएं भी बहा सकती है। उन्होंने कहा कि भविष्य में लोगों के पुनर्वास की योजना बनाते समय शुरुआत से ही जलवायु जोखिम को ध्यान में रखना होगा।

भूमि उपयोग के कड़े नियम, बुनियादी ढांचे की मंजूरी से पहले बेहतर जोखिम आकलन, सीमा पार निगरानी को मजबूत करना और शुरुआती चेतावनी प्रणालियां बेहतर बनाकर आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

हालांकि, सान्याल ने कहा कि 26 अगस्त की बाढ़ को लेकर 6.7 लाख लोगों को मोबाइल संदेश भेजे गए थे, लेकिन उनमें से कुछ पर्यटक या प्रवासी कामगार थे जो नेपाली भाषा नहीं समझते थे, जबकि कुछ लोगों ने खतरे को गंभीरता से नहीं लिया। नदियों के जलस्तर की निगरानी के लिए बनाए गए कुछ तंत्र भी बाढ़ में नष्ट हो गए या उनकी क्षमता से अधिक दबाव पड़ा।

नेपाल के नुवाकोट निवासी 62 वर्षीय चंदा लाल चित्रकार ने एपी को बताया कि उन्होंने चेतावनी संदेशों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। पानी बढ़ने पर वह अपनी जान बचाने के लिए पहाड़ी की ओर भागे।

सान्याल ने कहा कि चेतावनी संदेशों में लोगों को केवल खतरे की जानकारी देने के बजाय यह भी बताया जाना चाहिए कि उन्हें क्या कदम उठाने हैं। उन्होंने कम जोखिम वाले क्षेत्रों में विकास को प्राथमिकता देने, बुनियादी ढांचे का कई तरह के खतरों के लिहाज से आकलन करने और आपदा योजना में स्थानीय तथा आदिवासी समुदायों के ज्ञान को शामिल करने का सुझाव दिया।

जलवायु वार्ताकार ढकाल ने कहा कि वैश्विक तापमान वृद्धि के लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में नेपाल का योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी देश जलवायु परिवर्तन के कुछ सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें उन लोगों को जिम्मेदार ठहराना चाहिए जो वैश्विक तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं और जिन्होंने इतने लंबे समय तक जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था से लाभ उठाया है।’’

एपी मनीषा देवेंद्र

देवेंद्र