( ब्रॉनविन ली, क्वीन्सलैंड विश्वविद्यालय )
क्वींसलैंड, 28 मई (द कन्वरसेशन) ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में बड़े पैमाने पर की गई छंटनी का बचाव करते हुए अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस द्वारा कविता और तुकबंदी को लेकर की गई टिप्पणी पर साहित्य जगत में बहस छिड़ गई है।
बेजोस ने अखबार को आर्थिक सहायता देने के सवाल पर कहा था कि किसी उत्पाद के लिए लोग भुगतान करें, यह उसकी प्रासंगिकता का संकेत होता है। उन्होंने कहा, ‘‘अगर लोग हमारे उत्पाद के लिए भुगतान नहीं करेंगे तो इसका मतलब है कि हमारा उत्पाद पर्याप्त अच्छा नहीं है। यह तुकबंदी के बिना कविता जैसा होगा। यह बहुत आसान है।’’
उनकी इस टिप्पणी का सोशल मीडिया और साहित्यिक हलकों में व्यापक मजाक उड़ाया गया। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ के एक पूर्व साहित्य समीक्षक ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि यही मानदंड होता तो टी.एस. इलियट की प्रसिद्ध कविता ‘द वेस्ट लैंड’ को तुकबंदी की कमी के कारण अस्वीकार कर दिया जाता।
कुछ लोगों ने कविता की शैली में ही प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी में लिखा गया, ‘‘गुलाब लाल हैं, बैंगनी नीले हैं, बेजोस गलत हैं और उनके विचार भी।’’
हालांकि, लेख में कहा गया है कि बेजोस वास्तव में तुकबंदी की नहीं, बल्कि ‘‘बंधन’’ या ‘‘सीमाओं’’ की बात कर रहे थे। उनका आशय यह था कि किसी भी रचनात्मक कार्य में बाहरी दबाव या अनुशासन जरूरी होता है, चाहे वह कविता में तुकबंदी हो या पत्रकारिता में लाभ कमाने का दबाव।
लेख के अनुसार, अंग्रेजी कविता का इतिहास यह बताता है कि कविता हमेशा तुकबंदी पर निर्भर नहीं रही है। प्राचीन अंग्रेजी महाकाव्य ‘बियोवुल्फ’ जैसी रचनाएं तुकबंदी के बजाय लय और अनुप्रास पर आधारित थीं।
नॉर्मन विजय के बाद फ्रांसीसी प्रभाव से अंग्रेजी कविता में तुकबंदी का महत्व बढ़ा, क्योंकि इसे याद रखना और सुनना आसान था। धीरे-धीरे तुकबंदी को ही कविता का पर्याय मान लिया गया।
नॉर्मन विजय 11वीं सदी की एक ऐतिहासिक घटना है। 1066 ईस्वी में फ्रांस के ‘नॉर्मंडी’ क्षेत्र के ड्यूक, विलियम ने इंग्लैंड पर आक्रमण कर एंग्लो-सैक्सन शासन को समाप्त कर दिया था और इंग्लैंड के सिंहासन पर कब्ज़ा कर लिया था।
हालांकि, लेख में कहा गया है कि तुकबंदी कविता का अनिवार्य तत्व नहीं है और अंग्रेजी की कई महान कविताएं बिना नियमित तुकबंदी के लिखी गई हैं।
प्रसिद्ध कवि जॉन मिल्टन ने अपनी महाकाव्य रचना ‘पैराडाइज लॉस्ट’ बिना तुकबंदी के लिखी थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि तुकबंदी कविता का ‘‘आवश्यक आभूषण’’ नहीं है। मिल्टन का मानना था कि तुकबंदी कई बार कवि को विचारों की गहराई से अधिक शब्दों की सजावट में उलझा देती है।
इसी तरह विलियम शेक्सपीयर के अधिकांश नाटक ‘‘ब्लैंक वर्स’’ में लिखे गए हैं, जिनमें तुकबंदी नहीं होती, बल्कि लय और वाक्य संरचना के माध्यम से प्रभाव पैदा किया जाता है।
लेख में कहा गया है कि आधुनिक कविता का बड़ा हिस्सा ‘‘फ्री वर्स’’ यानी मुक्त छंद में लिखा जाता है। मुक्त छंद नियमित तुकबंदी या निश्चित लय पर आधारित नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसमें अनुशासन नहीं होता।
कवि टी.एस. इलियट का हवाला देते हुए लेख में कहा गया है कि कला में वास्तविक स्वतंत्रता नहीं होती। तुकबंदी हटने पर कविता में लय, शब्दों का क्रम, दोहराव और विचारों की गति जैसे अन्य तत्व अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
लेख में यह भी कहा गया है कि अच्छी तुकबंदी केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं होती, बल्कि वह पाठक को चौंकाती है और नए अर्थ पैदा करती है।
कवि लॉर्ड बायरन और एमिली डिकिंसन की कविताओं का उदाहरण देते हुए लेख में कहा गया कि तुकबंदी कभी-कभी व्यंग्य, असहजता या सूक्ष्म भावनात्मक प्रभाव पैदा करने का माध्यम बनती है।
रैपर एमिनेम का उदाहरण देते हुए लेख में कहा गया कि उन्होंने ‘‘ऑरेंज’’ शब्द के साथ असामान्य ध्वनियों का मेल बैठाकर यह दिखाया कि तुकबंदी केवल शब्दों के अंत में समान ध्वनि तक सीमित नहीं है।
लेख के अनुसार, खराब तुकबंदी करना आसान हो सकता है, लेकिन प्रभावशाली तुकबंदी बेहद कठिन कला है। केवल तुकबंदी का होना किसी कविता की गुणवत्ता सिद्ध नहीं करता।
लेख में निष्कर्ष निकाला गया है कि जिस तरह लाभ कमाना किसी अखबार की गंभीरता का प्रमाण नहीं होता, उसी तरह तुकबंदी किसी कविता की श्रेष्ठता की गारंटी नहीं है। सबसे बड़ी भूल यह है कि जो चीज आसानी से दिखाई या मापी जा सकती है, उसे ही सबसे महत्वपूर्ण मान लिया जाए।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश