(योषिता सिंह)
संयुक्त राष्ट्र, 15 जुलाई (भाषा) भारत का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का 80 साल पुराना ढांचा मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है और इसी वजह से यह वैश्विक संस्था दुनिया भर में जारी संघर्षों से उत्पन्न हो रही मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी साबित नहीं हुई।
भारत ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचे में भी बदलाव होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने मंगलवार को यहां संयुक्त राष्ट्र महासभा की अनौपचारिक बैठक ‘भविष्य के लिए समझौते की समीक्षा- मंत्रिस्तरीय गोलमेज बैठक-2 : भविष्य के अनुरूप बहुपक्षवाद को सक्षम बनाना’ को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रभावशीलता को लेकर ये बातें कहीं।
हरीश ने कहा, “हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों में सुरक्षा परिषद प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाई है।”
उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद प्रभावित आबादी की मानवीय पीड़ा को समाप्त करने में भी प्रभावी साबित नहीं हुई है।
राजदूत ने कहा, “इस कारण संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने पर भी सवाल उठने लगे हैं।”
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करने के एक दिन बाद हरीश का यह बयान आया।
इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र के राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।
भारत ने मंगलवार को कहा कि सुरक्षा परिषद की कमियों की मूल वजह साफ है।
हरीश ने कहा, “1940 के दशक के लिए तैयार किया गया 80 साल पुराना ढांचा आज की चुनौतियों से निपटने के लिए उपयुक्त नहीं है। संयुक्त राष्ट्र अब तक मिलकर भी सुरक्षा परिषद में सुधार के मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं कर पाया है।”
उन्होंने कहा कि अब तक की चर्चा अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) प्रक्रिया के तहत तैयार बयानों के अंतहीन दौर तक ही सीमित रही है और कुछ कदम केवल कागजों तक ही सीमित हैं।
राजदूत ने कहा, “यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है और इसमें बदलाव होना चाहिए।”
भाषा जितेंद्र माधव
माधव