(पीटर एडवेल, मैक्वेरी विश्वविद्यालय)
सिडनी, 22 मार्च (द कन्वरसेशन) क्या इसमें कोई अचरज की बात है कि प्राचीन समय में लोग आकाशीय बिजली को देवताओं की देन मानते थे? आज भी आकाशीय बिजली का डरावना अनुभव किसी अलौकिक घटना का आभास कराता है।
हालांकि, कुछ प्राचीन विचारकों को संदेह था कि इस रहस्यमयी चमक-गरज के पीछे देवताओं का कोई हाथ नहीं है।
अपने समय से सदियों आगे की सोच रखने वाले उन लोगों ने यह सवाल उठाया कि क्या बिजली का संबंध हवा और बादलों की हलचल से हो सकता है।
–शक्ति और क्रोध का संकेत–
प्राचीन यूनान और रोम की कथाओं में गरज और आकाशीय बिजली केवल प्राकृतिक घटना नहीं थी, बल्कि देवताओं के राजा ‘ज्यूस’ (जिन्हें रोमन लोग ज्यूपिटर कहते थे) का सबसे घातक अस्त्र मानी जाती थी। आसमान से गिरती हर बिजली मानो उनकी शक्ति और क्रोध का ऐलान करती थी।
लगभग 700 ईसा पूर्व, यानी होमर के दौर के प्राचीन यूनानी कवि हेसियोड ने अपने काव्य में वर्णन किया है कि ‘ज्यूस’ किस तरह अपने दिव्य शत्रुओं पर बिजली और गर्जन के प्रहार करते थे।
कथाओं में यह भी मिलता है कि ज्यूस ने मनुष्यों पर भी बिजली गिराई। मिथकीय राजा साल्मोनियस को उन्होंने इसलिए दंडित किया, क्योंकि वह अपने प्रजा से स्वयं को देवता की तरह पूजने के लिए कहता था।
यूनान और रोम की प्राचीन मूर्तियां ‘ज्यूस’ के हाथ में अक्सर बिजली कड़कने को प्रदर्शित करने वाले संकेत को दर्शाती हैं-मानो वही उनका सबसे प्रभावशाली अस्त्र हो।
रोमन मान्यताओं में ज्यूपिटर और अन्य देवता बिजली की कड़क के जरिए सीधे मानव जीवन में दखल देते थे। आसमान से गिरती बिजली को अक्सर देवताओं की नाराजगी का साफ संकेत माना जाता था।
रोम के शक्तिशाली रिपब्लिकन जनरल में गिने जाने वाले पोम्पी के पिता की 87 ईसा पूर्व में कथित तौर पर बिजली गिरने से मृत्यु हुई थी। उस समय वह गृहयुद्ध के बीच सैन्य अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।
रोमन लेखक प्लूटार्क के अनुसार, पोम्पी के पिता रोम के सबसे अलोकप्रिय जनरल में से एक थे। ऐसे में बहुत से लोगों का मानना था कि यह कोई साधारण दुर्घटना नहीं, बल्कि देवताओं का न्याय था।
–जटिल अनुष्ठान और देवताओं का वरदान–
कभी-कभी आकाशीय बिजली को देवताओं का वरदान भी माना जाता था। कहा जाता है कि 160 ईसा पूर्व में जब रोमन सम्राट मार्कस ऑरेलियस एक जनजातीय समूह के खिलाफ अभियान चला रहे थे, तब युद्ध के बीच गिरी बिजली ने दुश्मनों को तितर-बितर कर दिया।
चर्च इतिहासकार यूसेबियस के अनुसार, उस घटना के बाद सम्राट के साथ चल रही सेना को “थंडरिंग लीजन” यानी वज्रपात के नाम से जाना जाने लगा।
रोमन धार्मिक परंपराओं में जहां कहीं बिजली गिरती थी, वहां विशेष और जटिल अनुष्ठान किए जाते थे। जिसे “बिडेंटल अनुष्ठान” कहा जाता था, उसमें पुरोहित उस स्थान को शुद्ध करते थे। इसके बाद उस जगह को पवित्र मानकर बंद कर दिया जाता था — वहां चलना तो दूर, उसे देखना तक वर्जित समझा जाता था।
यहां तक कि सम्राट कॉन्स्टेंटाइन भी परंपराओं से पूरी तरह अलग नहीं हो सके जिन्होंने अपने शासन के शुरुआती दौर से ही ईसाई धर्म का समर्थन शुरू कर दिया था। 320 ईसा पूर्व में जब कुछ सार्वजनिक इमारतों पर बिजली गिरी, तो उन्होंने पारंपरिक रोमन ‘पैगन’ नामक धार्मिक अनुष्ठान करवाने का आदेश दिया।
–इसमें देवता का हाथ नहीं–
जहां बहुत से लोग पूरे विश्वास के साथ मानते थे कि आकाशीय बिजली देवताओं के क्रोध का अस्त्र है, वहीं कुछ ऐसे भी थे जिन्हें इस धारणा पर संदेह था।
प्राचीन यूनानी नाटककार अरिस्टोफेनीज (लगभग 448 से 380 ईसा पूर्व) के प्रसिद्ध नाटक “द क्लाउड्स” में एक दृश्य दिखाया जाता है जब तेज तूफान के बीच दार्शनिक सुकरात अचानक कह उठते हैं- “ऊपर ज्यूस नहीं हैं, वह तो हवा का भंवर है।”
यह कथन अपने समय की मान्यताओं को सीधी चुनौती देता था।
पहली ईस्वी के रोमन दार्शनिक सेनेका का मानना था कि जब बादल हल्के बल से टकराते हैं तो बिजली की चमक पैदा होती है, और जब टकराव अधिक बल से होता है तो वज्रपात होता है।
सेनेका की दृष्टि में इन घटनाओं के पीछे देवताओं की कोई भूमिका नहीं थी।
(द कन्वरसेशन) खारी संतोष
संतोष