पढ़े-लिखे और विज्ञान के समर्थक लोग भी अंधविश्वास पर भरोसा क्यों करते हैं ?

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पढ़े-लिखे और विज्ञान के समर्थक लोग भी अंधविश्वास पर भरोसा क्यों करते हैं ?

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  • Publish Date - February 25, 2026 / 04:11 PM IST,
    Updated On - February 25, 2026 / 04:11 PM IST

( मिकाह गोल्डवाटर, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी )

सिडनी, 25 फरवरी (द कन्वरसेशन) बचपन में हममें से कई लोगों को बताया जाता है कि बाल गीले होने पर बाहर निकलने से सर्दी लग जाती है। बड़े होने पर भी हम बाहर जाने से पहले बाल अच्छी तरह सुखाने में अतिरिक्त समय लगा देते हैं।

अंग्रेजी भाषी देशों में कई ऊंची इमारतों में 13वीं मंजिल को अंकित नहीं किया जाता, जबकि पूर्वी एशिया में अक्सर चौथी मंजिल को छोड़ दिया जाता है।

यदि जिस खिलाड़ी का मैं समर्थन करता हूं और वह लगातार जीत रहा हो तथा कोई कमेंटेटर उसका जिक्र कर दे, तो मुझे लगता है कि अब अपशगुन हो जाएगा और उसकी जीत का सिलसिला टूट जाएगा।

ये सब अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यताएं हैं। विज्ञान के प्रति जागरूक समाज होने के बावजूद ये मान्यताएं कायम रहती हैं।

सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है और क्या इसमें कोई नुकसान है?

ऐसी कई मान्यताओं की जड़ें पुराने चिकित्सा और सांस्कृतिक विश्वासों में हैं। प्राचीन यूनानी और चीनी चिकित्सा में स्वास्थ्य को शरीर और पर्यावरण के संतुलन से जोड़ा जाता था। तापमान को बीमारी का कारण माना जाता था।

आज विज्ञान स्पष्ट करता है कि सर्दी-जुकाम का मुख्य कारण वायरस है। हालांकि कुछ शोध बताते हैं कि ठंड में शरीर वायरस के प्रति थोड़ा अधिक संवेदनशील हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गीले बाल ही बीमारी का कारण बनते हैं।

मनोविज्ञान बताता है कि मनुष्य स्वभाव से “सेंस-मेकिंग” प्राणी है—यानी वह हर घटना की व्याख्या करना चाहता है। यह प्रेरणा भूख या अकेलेपन जैसी मूल मानवीय जरूरतों के समान हो सकती है। लेकिन व्याख्या करने की यह इच्छा सही निष्कर्ष की गारंटी नहीं देती। हमारा ज्ञान अलग-अलग स्रोतों से आया बिखरा हुआ “पज़ल” होता है—कुछ विज्ञान की कक्षा से, कुछ पारिवारिक परंपराओं से। जरूरत पड़ने पर हम इन टुकड़ों को जोड़कर निष्कर्ष निकाल लेते हैं, भले ही वे पूरी तरह वैज्ञानिक न हों।

अक्सर वैज्ञानिक और पुरानी मान्यताएं साथ-साथ मौजूद रहती हैं। दक्षिण अफ्रीका में एचआईवी/एड्स संकट के बाद हुए अध्ययन में पाया गया कि वैज्ञानिक जानकारी मिलने के बाद भी कुछ लोग बीमारी को जादू-टोना से जोड़ते रहे। शोधकर्ताओं ने इसे “व्याख्यात्मक सह-अस्तित्व” कहा—जहां वैज्ञानिक और पारंपरिक धारणाएं एक साथ टिकती हैं।

खतरा तब पैदा होता है जब सतही वैज्ञानिक समझ के आधार पर कथित छद्म-विज्ञान फैलता है। कोविड-19 महामारी के दौरान ब्लीच या धूप में बैठने से संक्रमण ठीक होने जैसी अफवाहें फैलीं। कुछ लोग यह जानते थे कि ब्लीच और धूप कीटाणु मारते हैं, इसलिए उन्होंने इस अधूरी जानकारी को गलत संदर्भ में फैलाया।

हम अपनी मान्यताओं के निर्माण में दूसरों पर भरोसा करते हैं—चाहे वे डॉक्टर हों, विशेषज्ञ हों या परिवार के बुजुर्ग। व्यक्तिगत अनुभव और किस्से भी हमारे फैसलों को प्रभावित करते हैं, भले ही वैज्ञानिक प्रमाण उनके विपरीत हों।

हर अंधविश्वास हानिकारक नहीं होता। बाल सुखाकर बाहर निकलना या खेल में अपशगुन मान लेना नुकसानदेह नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल राशि के आधार पर रिश्ते से इंकार कर दे या चिकित्सा सलाह छोड़ दे, तो यह समस्या बन सकती है। इसमें अंधविश्वास की जगह ही नहीं है।

अपने विश्वासों की जांच करना और यह समझना कि हम किसी बात पर क्यों विश्वास करते हैं, महत्वपूर्ण है। विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी लेकर अपने ज्ञान को मजबूत बनाना हमें बेहतर और तर्कसंगत निर्णय लेने में मदद कर सकता है।

(द कन्वरसेशन ) मनीषा संतोष

संतोष