(इयान विलियम्स, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन )
साउथैम्पटन (इंग्लैंड), 19 मई (द कन्वरसेशन) यूरोप में बड़े पैमाने पर भोजन बर्बाद हो रहा है, जबकि दुनिया भर में करोड़ों लोग भूख से जूझ रहे हैं। यूक्रेन और पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों ने आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बढ़ाया है और जीवन-यापन की लागत संकट ने कई परिवारों को आर्थिक रूप से प्रभावित किया है।
इसके बावजूद, घरों में अभी भी खाने योग्य भोजन फेंका जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल अपव्यय नहीं है, बल्कि कैलोरी, पैसे और पर्यावरणीय संसाधनों की भारी बर्बादी भी है।
एक नए विश्लेषण के अनुसार, यूरोप में प्रति व्यक्ति हर साल 70 किलोग्राम से अधिक भोजन फेंक दिया जाता है। अनुमान है कि 2025 में यूरोप और ब्रिटेन में मिलाकर लगभग 6.9 करोड़ टन भोजन बर्बाद हुआ।
वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है—2022 में घरों, रिटेल और फूड सर्विस सेक्टर मिलाकर 1.052 अरब टन भोजन बर्बाद हुआ।
यूरोपीय आयोग के अनुसार, चार लोगों का एक परिवार हर साल लगभग 400 यूरो (करीब 346 पाउंड) का भोजन बचा सकता है यदि वह बर्बादी को रोके।
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल पैसे की नहीं है, बल्कि मुख्य कारण जानकारी और समझ की कमी, “एक्सपायरी डेट” को लेकर भ्रम, स्वास्थ्य संबंधी डर और सुविधा आधारित जीवनशैली है।
विशेषज्ञों के अनुसार सुपरमार्केट की छूट योजनाएं जैसे “एक खरीदो एक मुफ्त पाओ” या “तीन के दाम दो” लोगों को जरूरत से ज्यादा खरीदारी के लिए प्रेरित करती हैं।
समय की कमी, भूख लगने पर खरीदारी और बड़े पैक साइज भी अपव्यय बढ़ाते हैं, खासकर अकेले रहने वाले लोगों के लिए। विश्लेषण से यह भी सामने आया कि जो लोग खरीदारी से पहले योजना बनाते हैं और फ्रिज की जांच करके लिस्ट के साथ खरीदारी करते हैं, वे कम भोजन फेंकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि “बेस्ट बिफोर” और “यूज बाय” जैसे लेबल को लेकर भ्रम के कारण भी बड़ी मात्रा में खाने योग्य भोजन फेंक दिया जाता है। कई लोग सुरक्षा के डर से भोजन को समय से पहले ही फेंक देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रीजिंग, बैच कुकिंग और पुराने सामान को पहले उपयोग करने जैसी सरल आदतें खाद्य अपव्यय को काफी हद तक कम कर सकती हैं।
आज की तेज जीवनशैली में योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। मेहमाननवाजी और “अधिक परोसने” की सामाजिक परंपरा भी भोजन की बर्बादी बढ़ाती है, क्योंकि कई संस्कृतियों में अधिक भोजन को उदारता का प्रतीक माना जाता है।
समाधान के तौर पर अध्ययन में तीन प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं—
पहला, खाद्य लेबलिंग को स्पष्ट और मानकीकृत किया जाए और लोगों को जागरूक किया जाए कि “क्वालिटी” और “सेफ्टी” में अंतर क्या है।
दूसरा, खुदरा बाजार में छोटे पैक, रीसीलेबल पैकेज और कम कीमत पर निकट-एक्सपायरी उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया जाए।
तीसरा, घरों को सीधे समर्थन दिया जाए—जैसे कुकिंग क्लास, फ्रिज मैनेजमेंट अभियान और डिजिटल टूल्स जो घर में मौजूद भोजन की जानकारी दें।
इसके अलावा, भोजन अपशिष्ट को लैंडफिल में जाने से रोकने के लिए अलग कलेक्शन और प्रोसेसिंग सिस्टम विकसित करने की भी जरूरत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कोई एक उपाय पर्याप्त नहीं होगा बल्कि नीति, खुदरा व्यवस्था और घरेलू व्यवहार—तीनों स्तरों पर सुधार जरूरी है।
छोटे-छोटे बदलाव जैसे सही खरीदारी, बेहतर भंडारण और स्पष्ट लेबलिंग से न केवल भोजन की बर्बादी कम होगी, बल्कि पैसा, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा—तीनों की बचत होगी।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश