पटना, 18 फरवरी (भाषा) पटना उच्च न्यायालय ने ‘बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016’ के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने में राज्य मशीनरी की ‘‘विफलता’’ को लेकर बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि इससे राज्य के नागरिकों का जीवन जोखिम में पड़ रहा है।
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की पीठ 19 वर्षीय याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
पीठ ने 17 फरवरी पारित आदेश में कहा, ‘‘इस अदालत का मानना है कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 को ठीक से लागू न कर पाने में सरकारी तंत्र की नाकामी से राज्य के लोगों की जान खतरे में पड़ रही है।’’
अदालत ने कहा कि मद्यनिषेध से शराब की समस्या कम होने के बजाय अवैध शराब का समानांतर कारोबार खड़ा हो गया और शराबखोरी में वृद्धि हुई है।
अदालत ने नाबालिगों तथा 18-19 वर्ष के युवाओं का अवैध शराब की तस्करी में इस्तेमाल किए जाने की ‘‘चिंताजनक प्रवृत्ति’’ पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने यह भी कहा कि मिथाइल अल्कोहल और यूरिया जैसी चीजे मिलाकर बनाई गई जहरीली शराब पीने से राज्य में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा चुकी है।
वैज्ञानिक तथ्यों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि पांच मिलीलीटर मिथाइल अल्कोहल से अंधापन हो सकता है और 10 मिलीलीटर से अधिक मात्रा घातक हो सकती है। अदालत ने यह भी बताया कि इसके गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे शरीर में ज्यादा अम्ल बनना (एसिडोसिस) और किडनी का काम करना बंद हो जाना।
अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि गिरफ्तारी या चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण की स्थिति में उसे 10,000 रुपये के जमानत बांड पर रिहा किया जाए।
साथ ही, गोपालगंज की जिला अदालत को उसके आपराधिक इतिहास का सत्यापन करने का निर्देश दिया गया और कहा गया कि यदि वह अन्य मामलों में संलिप्त पाया जाता है तो राहत स्वतः समाप्त हो जाएगी।
पीठ ने यह भी कहा कि अदालतें मुख्य सचिव को यह सलाह देने के अपने संवैधानिक दायित्व से पीछे नहीं हट सकतीं कि युवा आरोपियों, विशेषकर 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के लोगों, के उचित पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
इस बीच, राष्ट्रीय लोक मोर्चा विधायक माधव आनंद ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली तत्कालीन महागठबंधन सरकार द्वारा लागू मद्यनिषेध कानून की ‘‘विस्तृत समीक्षा’’ की मांग की, हालांकि राज्य सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया।
भाषा कैलाश खारी
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