अपनी पार्टी के पूर्ण बहुमत के बिना लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश चले राज्यसभा की ओर

Ads

अपनी पार्टी के पूर्ण बहुमत के बिना लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश चले राज्यसभा की ओर

  •  
  • Publish Date - March 5, 2026 / 04:54 PM IST,
    Updated On - March 5, 2026 / 04:54 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

पटना, पांच मार्च (भाषा) नीतीश कुमार इतिहास में एक ऐसे चतुर राजनेता के रूप दर्ज होंगे जिन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद पर अपने सभी पूर्ववर्तियों से अधिक समय तक बने रहने में सफलता हासिल की, जबकि उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को विधानसभा में कभी भी पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

विडंबना यह है कि उनके कुछ कट्टर समर्थक उन्हें ‘दरबारी साज़िश’ का शिकार मानते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि अवसरवादिता ने ही उन्हें इस स्थिति तक पहुंचाया है।

पार्टी के भीतर की भावना का अंदाज़ा समाज कल्याण मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता मदन साहनी की टिप्पणी से लगाया जा सकता है।

साहनी ने कहा, “जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर हम स्तब्ध हैं। यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह नीतीश कुमार का अपना फैसला हो सकता है।”

उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकर हैरानी हो रही है कि जदयू सुप्रीमो की “लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा—तीनों सदनों का सदस्य बनने की लंबे समय से इच्छा” थी, जिसे वह मौजूदा द्विवार्षिक चुनावों में राज्यसभा सदस्य बनकर पूरा करना चाहते हैं।

जदयू कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के पास जाने से पुलिस द्वारा रोक दिये जाने पर पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ कर अपना गुस्सा जताया। वे इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि उनके नेता, जिन्हें दिवंगत सुशील कुमार मोदी समेत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ प्रशंसक कभी “प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार” मानते थे, इस तरह का “अपमानजनक प्रस्थान” स्वीकार कर सकते हैं।

कभी नीतीश कुमार सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे राजद के कार्यकारी अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा, “भाजपा ने बिहार में महाराष्ट्र जैसा खेल कर दिया है। लेकिन इसके लिए नीतीश कुमार खुद ही जिम्मेदार हैं। हमारे साथ गठबंधन में रहते हुए हमने अधिक विधायक होने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री का समर्थन दिया, लेकिन उन्होंने दो बार साथ छोड़ दिया।”

हालांकि, पिछले सप्ताह 75 वर्ष के हुए कुमार के पास पीछे मुड़कर देखने के लिए कई उपलब्धियां भी हैं। वर्ष 1970 के दशक में इंजीनियरिंग छात्र के रूप में उन्होंने राजनीति की शुरुआत की और समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले ‘जेपी आंदोलन’ से अपनी राजनीतिक यात्रा की नींव रखी।

उन्हें पहली चुनावी सफलता 1985 में मिली, जब उन्होंने अपने गृह जिला नालंदा की हरनौत विधानसभा सीट से जीत हासिल की।

चार साल बाद वह संसद पहुंचे और बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने। मंडल आयोग के बाद उभरे पिछड़े वर्गों के राजनीतिक उत्थान ने उन्हें वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनने का मौका दिलाया।

उन्होंने 1995 में जनता दल से अलग रास्ता अपनाया। उस समय उनके पुराने सहयोगी लालू प्रसाद का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। लालू प्रसाद उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे, मंडल राजनीति के मुखर समर्थक के रूप में उभर रहे थे और उन्होंने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की ‘राम रथ यात्रा’ को रोकने के लिए उन्हें गिरफ्तार भी कराया था।

सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण कुमार ने भाकपा (मार्क्सवादी लेनिनवादी) लिबरेशन जैसे उग्र वामपंथी संगठन के साथ भी हाथ आजमाया, लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि यह चुनावी तौर पर व्यवहारिक नहीं है। बाद में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस की मदद से समता पार्टी बनाई। उन्होंने 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी के रूप में चुनाव लड़ा।

भाजपा के साथ लगातार बने रहने से उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला। वाजपेयी ने ही 2000 में बिहार में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद के वास्ते उनके प्रयास में साथ दिया।

एक कुशल रणनीतिकार के रूप में कुमार ने जनता दल के वरिष्ठ नेता शरद यादव को, जिनके लालू प्रसाद से संबंध बिगड़ चुके थे, साथ आने के लिए राजी किया। इसी के साथ जनता दल यूनाइटेड का गठन हुआ।

बिहार में भाजपा को “उच्च जातियों की पार्टी” के रूप में देखा जाता था, इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने कुछ राजनीतिक जमीन जदयू के लिए छोड़ी। वर्ष 2005 के दोनों विधानसभा चुनावों में जदयू ने भाजपा से अधिक सीट पर चुनाव लड़ा और नवंबर 2005 में हुए चुनाव में राजग को निर्णायक जीत मिली।

इसके बाद से नीतीश कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके आलोचक भी मानते हैं कि उनके शासन का रिकॉर्ड उनके पूर्ववर्तियों की तुलना में बेहतर रहा है। इसी के चलते 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन ने 243 में से 206 सीट जीतकर शानदार प्रदर्शन किया।

राष्ट्रीय राजनीति में हो रहे बदलावों के बीच कुमार को कभी-कभी नरेन्द्र मोदी के संभावित विकल्प के रूप में भी देखा गया। इसी प्रतिद्वंद्विता के चलते उन्होंने तब भाजपा से संबंध तोड़ लिया, जब मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया। मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया जाना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उनकी संभावित घोषणा का संकेत माना गया।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू की करारी हार के बाद कुमार ने “नैतिक जिम्मेदारी” लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन उन्होंने ‘सुपर मुख्यमंत्री’ की तरह काम करना जारी रखा, जबकि जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे। बाद में उन्होंने लालू प्रसाद के समर्थन से मांझी को हटाकर दोबारा मुख्यमंत्री पद संभाला।

इन दो पुराने प्रतिद्वंद्वियों का गठबंधन 2015 के विधानसभा चुनाव में बेहद सफल रहा, जिसमें भाजपा को कई वर्षों में सबसे खराब प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, जबकि देश में “मोदी लहर” चल रही थी।

हालांकि, ‘महागठबंधन’ ज्यादा समय तक नहीं टिक सका और दो साल बाद कुमार ने फिर से भाजपा के साथ हाथ मिला लिया।

तब से “पलटूराम” जैसा व्यंग्यात्मक शब्द नीतीश कुमार के साथ जुड़ गया, हालांकि कानून-व्यवस्था में सुधार, विकास कार्यों और महिलाओं के सशक्तीकरण पर जोर देने जैसी उपलब्धियों को भी स्वीकार किया जाता है।

अब जब उनके पुत्र निशांत, जो लगभग 40 वर्ष की आयु में हैं, राजनीति में प्रवेश करने की तैयारी कर रहे हैं, तो संभव है कि कुमार उस नैतिक ऊंचाई से भी नीचे आ जाएं, जिस पर खड़े होकर वह लंबे समय तक “परिवारवाद” की आलोचना करते रहे थे।

भाषा कैलाश

राजकुमार

राजकुमार