NindakNiyre: यही बिल, यही संसद, यही विपक्ष और यही ड्रॉफ्ट इसी मॉनसून सेशन में लेकर आना होगा, वरना खत्म हो जाएगी क्षेत्रीय दलों की पुरुष केंद्रित सियासत
Nari Vandan women bill
बरुण सखाजी, राजनीतिक विश्लेषक
नारीवंदन के संशोधन वाले बिल को गिराकर बड़ी गलती हो गई। अगर समझदारी होगी तो मॉनसून में यही बिल लाकर पास करवाया जाएगा। मैं अपनी बात निष्कर्ष से ही शुरू कर रहा हूं। यह तो स्पष्ट है 2023 में पास नारी वंदन अधिनियम नोटीफाई हो चुका है। इसमें दो शर्तें हैं, पहली आगामी जनगणना, दूसरी परिसीमन। जनगणना का शिड्यूल जारी हो चुका है। इसके नतीजे 2027 लास्ट तक प्राप्त हो जाएंगे। इसके आधार पर परिसीमन होगा और परिसीमन में 33 फीसद महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होंगी।
इसे बारीकी से पढ़िए
परिसीमन में साल 2002 से 2008 तक 6 वर्षों का वक्त लगा था। कारण था उस वक्त की देश में राजनीतिक अस्थिरता। किंतु अबकी यह समय घटकर 6 से 10 महीने भी हो सकता है। इस लिहाज से देखें तो 2027 में प्राप्त आंकड़ों के आधार पर परिसीमन 2028 दिसंबर तक हो सकता है। यानि 2026 में जब लोकसभा में 543 में से 74 और राज्यसभा में 250 में से 31 महिलाएं हैं। ये 33 फीसद के हिसाब से बढ़कर लोकसभा में 179 और राज्यसभा में 83 हो जाएंगी। सोचिए, मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से लोकसभा में 104 राज्यसभा में 53 पुरुषों की सियासत खत्म हो जाएगी। विधानसभाओं में यह संख्या हजारों तक है। सीटें बढ़ती तो पुरुषों के साथ महिलाओं को भी उनका हक मिल पाता।
पुरुष नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट
अब सोचिए, चूंकि 2023 में पास नारी वंदन अधिनियम में सीटें बढ़ाने का प्रावधान नहीं है। लेकिन महिलाओं की संख्या 33 फीसद होगी। इससे बड़े-बड़े पुरुष नेताओं की सीटें प्रभावित होंगी। इसका ज्यादा नुकसान उन्हें होगा जिनके पास लड़ने, जीतने की सीटें बहुत सीमित होती हैं। इनमें भी उनके जिताऊ पुरुष नेता नहीं लड़ पाएंगे। वे अगर चुनाव में उतर ही न पाए, या ऐसी जगह से उतरे जहां उनका वोट समीकरण बिगड़ रहा है तो नतीजे भी बिगड़ेंगे।
तो किसे कितना नुकसान, कितना फायदा
विरोध करने वालों डीएमके, टीएमसी, कांग्रेस, सपा, वामदलों को प्रमुखता से रखते हैं। डीएमके की अभी लोकसभा में 21 सीटें हैं। इनमें से महिलाएं 4 हैं। पार्टी ने चुनाव में 21 उम्मीदवार ही उतारे थे। कांग्रेस की लोकसभा में 99 सीटें हैं इनमें सिर्फ 14 महिलाएं हैं। देश में 328 टिकटें बांटी थी इनमें 41 महिलाओं को दी थी। टीएमसी की 29 सीटें और महिलाएं 11 हैं। टीएमसी ने 2024 में 42 उम्मीदवार में 12 महिलाएं थी। सपा की सीटें 37 और महिलाएं 4 हैं। सपा ने 2024 में 62 उम्मीदवारों में सिर्फ 4 महिलाएं थी। वामदलों की सबकी मिलाकर सीटें 5 और महिलाओं की संख्या 1 है। 2024 में वामदलों ने 79 में 4 महिलाओं को टिकट दिया था। भाजपा की 240 और महिलाओं की संख्या 31 है। भाजपा से 2024 में 446 में 69 महिलाएं लड़ी थी। टीएमसी छोड़ दें तो कांग्रेस में सर्वेसर्वा राहुल गांधी, सपा में अखिलेश, डीएमके में स्टालिन, वामदलों में अलग-अलग चेहरे लेकिन महिलाएं लगभग कोई नहीं। अब चुनाव की तस्वीर खींचिए। 2024 में मैदान में उतारे उम्मीदवार के हिसाब से डीएमके को 7 सीटें देनी पड़ेंगी महिलाओं को। पुरुष लड़ेंगे 14 पर। ऐसे ही सपा को देना होंगी 20 सीटें। पुरुष लड़ पाएंगे सिर्फ 42 पर। टीएमसी को 15 सीटें महिलाओं को देना होंगी और पुरुष लड़ पाएंगे 27 पर। वामदलों को 26 सीटें महिलाओं को देना होंगी। पुरुषों के लिए बचेंगी सिर्फ 53 सीटें। डीएमके, सपा, वामदलों के बड़े धुंरधर पुरुष नेता नहीं लड़ पाएंगे या सीटें बदलेंगे या सीट बदलने से हार जाएंगे या संगठन में भेज दिए जाएंगे। डीएमके अपने सीनीयर नेताओं को तभी बचाएगा जब उसके परिवार की सीटें बचेंगी। ऐसे ही सपा अखिलेश और परिवार को बचाएगी तब पार्टी के किसी दूसरे नेता की बारी आएगी। ऐसे ही वामदलों में मान लीजिए। अब इन आंकड़ों के हिसाब से इन दलों के लगभग 100 प्रभावशाली और बड़े पुरुष नेता चुनावी राजनीति से बाहर हो सकते हैं। लेकिन इसका ज्यादा असर कांग्रेस-भाजपा पर नहीं पड़ेगा। क्योंकि इनका साइज बड़ा है।
कांग्रेस ने समर्थन क्यों नहीं किया
धैर्यहीन कांग्रेस अभी अपने फ्यूचर से ज्यादा वर्तमान को लेकर चिंतित है। भाजपा को 15 साल हो जाएंगे। 10 साल में किक डाउन हुआ था, 15 में अगर कांग्रेस गंभीर नेतृत्व और संगठन के साथ सृजन केंद्रित हुई तो फायदा है। मगर यहां तो हर उस गतिविधि को हवा देने पर ज्यादा जोर है जो देश विरोधी हो।

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