कार्बन-प्रधान क्षेत्रों में अधिक ऋण देने वाले बैंकों पर बढ़ सकता है जोखिम: अध्ययन

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कार्बन-प्रधान क्षेत्रों में अधिक ऋण देने वाले बैंकों पर बढ़ सकता है जोखिम: अध्ययन

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  • Publish Date - April 12, 2026 / 06:21 PM IST,
    Updated On - April 12, 2026 / 06:21 PM IST

नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) कार्बन-प्रधान क्षेत्रों को अधिक कर्ज देने वाले बैंकों को समय के साथ अधिक ऋण जोखिम का सामना करना पड़ सकता है, जिससे निगरानी और वसूली की लागत बढ़ सकती है। आईआईएम लखनऊ के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।

संस्थान के शोधकर्ताओं की टीम ने इस अध्ययन के जरिए यह समझने का प्रयास किया कि कार्बन-प्रधान क्षेत्रों को दिए जाने वाले ऋण का बैंकों की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिति और कार्यकुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है।

यह अध्ययन ‘जर्नल ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंशियल मार्केट्स, इंस्टीट्यूशंस एंड मनी’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें कहा गया है कि स्थिरता और वित्तीय प्रदर्शन आपस में जुड़े हुए हैं और वैश्विक स्तर पर कम-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर हो रहे बदलाव के साथ वित्तीय रणनीतियों का तालमेल जरूरी है।

अध्ययन में कहा गया कि बैंक सीधे कार्बन उत्सर्जन नहीं करते, लेकिन जीवाश्म ईंधन और भारी उद्योग जैसे अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों को वित्तपोषण देकर अप्रत्यक्ष रूप से इसमें भूमिका निभाते हैं।

अध्ययन के सह-लेखक विकास श्रीवास्तव ने कहा, “वित्तीय संस्थान ऐसे परिवर्तन संबंधी जोखिमों का सामना कर रहे हैं, जो पारंपरिक जोखिम आकलन में तुरंत दिखाई नहीं देते। यह शोध इस बात पर जोर देता है कि बदलती जलवायु नीतियों के संदर्भ में दीर्घकालिक दृष्टिकोण से क्षेत्रीय जोखिमों को ध्यान में रखना आवश्यक है।”

उन्होंने बताया कि 26 देशों के 158 बैंकों के विश्लेषण से पता चला है कि कार्बन-गहन क्षेत्रों में अधिक निवेश करने वाले बैंक समय के साथ कम दक्ष हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि इन क्षेत्रों पर नियामकीय निगरानी बढ़ रही है और नीतिगत बदलाव हो रहे हैं, जिससे ये उधारकर्ता अधिक जोखिमपूर्ण बनते जा रहे हैं।

अध्ययन की सह-लेखक सौम्या सुब्रमण्यम ने कहा कि इस शोध की एक खास विशेषता कार्बन-क्षेत्र जोखिम को मापने का तरीका है, जिसमें ऋण के संकेंद्रण और कार्बन उत्सर्जन दोनों को शामिल किया गया है।

उन्होंने कहा, ‘यह तरीका बैंकों के ऋण पोर्टफोलियो में छिपे जोखिमों का अधिक सटीक आकलन करने में मदद करता है। अध्ययन मजबूत पूंजी आधार के महत्व को भी रेखांकित करता है। अधिक पूंजी वाले बैंक इन जोखिमों को बेहतर तरीके से झेल सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले प्रभाव को सीमित कर सकते हैं।’

शोधकर्ताओं ने बैंकों को सलाह दी है कि वे दीर्घकालिक जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अपने ऋण पोर्टफोलियो पर पुनर्विचार करें।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि नियामकों के लिए यह शोध उपयोगी सुझाव देता है, जिससे वे जलवायु जोखिम और पूंजी से जुड़ी प्रभावी नीतियां बना सकें। इसमें यह भी रेखांकित किया गया है कि हरित पोर्टफोलियो की ओर बढ़ना पर्यावरण और कारोबार दोनों के लिए लाभकारी है।

भाषा योगेश पाण्डेय

पाण्डेय