Narmada River Milk Controversy: 11000 लीटर दूध से नर्मदा का अभिषेक.. 41 टन दुर्लभ जड़ी-बूटियों की आहूति, जानिए कौन हैं 21 दिनों का अनुष्ठान करने वाला बाबा शिवानंद महाराज?

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11000 लीटर दूध से नर्मदा का अभिषेक.. 41 टन दुर्लभ जड़ी-बूटियों की आहूति, Narmada River Milk Controversy Baba Shivanand Kon Hai

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  • Publish Date - April 12, 2026 / 06:19 PM IST,
    Updated On - April 12, 2026 / 06:19 PM IST

Narmada River Milk Controversy. Image Source- IBC24

सिहोर/भोपालः Narmada River Milk Controversy मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नर्मदा नदी के आंचल में आस्था और संसाधनों के उपयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। सीहोर जिले का सतदेव गांव में आस्था के नाम पर 11,000 लीटर दूध नर्मदा में बहाया गया। इसे लेकर अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं कि जहां 10 लाख बच्चे आज भी कुपोषण की जंग लड़ रहे हैं, वहां क्या दूध की एक-एक बूंद किसी मासूम का गला तर नहीं कर सकती थी? क्या आस्था के नाम पर हजारों लीटर संसाधनों को बहा देना जायज है? आस्था और सामाजिक सरोकार के बीच छिड़ी इस बहस ने प्रशासन से लेकर आम जनता तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

दरअसल, मध्य प्रदेश के सीहोर जिले का सतदेव गांव भक्ति के एक अनूठे रंग में रंगा नजर आया। श्री दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर में चैत्र नवरात्रि के मौके पर बाबा शिवानंद महाराज की अगुवाई में 21 दिवसीय महा-अनुष्ठान हुआ। 18 मार्च से शुरू हुए इस धार्मिक अनुष्ठान के लिए करीब 5 एकड़ की भूमि पर एक विशाल आध्यात्मिक नगरी बसाई गई, लेकिन इस आयोजन की सबसे ज्यादा चर्चा इसमें इस्तेमाल हुई सामग्री और इसके पैमाने को लेकर हो रही है। ये महज एक पूजा नहीं, बल्कि संसाधनों का एक विशाल समर्पण था, जिसे शास्त्रोक्त विधि से पूरा करने का दावा किया गया है।

इस अनुष्ठान के खर्च और चढ़ावे के आंकड़ों पर गौर करें तो ये किसी को भी हैरान कर सकता है। 21 दिनों तक चले अनुष्ठान में करीब 41 टन विशेष पूजन सामग्री और दुर्लभ जड़ी-बूटियां स्वाहा की गईं। इस अनुष्ठान में केवल अन्न या लकड़ियां ही नहीं, बल्कि सोने और चांदी की आहुतियां भी दी गईं। आयोजन के लिए 5 एकड़ के क्षेत्र में अस्थाई ढांचा
और यज्ञशाला तैयार की गई थी. जिस पर लाखों का खर्च अनुमानित है। आयोजकों के मुताबिक, इस 21 दिवसीय आयोजन का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय था। इसमें लगने वाली सामग्री और खर्च का बड़ा हिस्सा भक्तों के दान और सहयोग से जुटाया गया था। रोजाना होने वाले विशेष पाठ और अभिषेक में भी क्विंटल के हिसाब से फल, फूल और अन्य नैवेद्य का उपयोग हुआ, जिसके बाद मां नर्मदा को 11 हजार लीटर दूध का महा अभिषेक किया गया। सीहोर का ये अनुष्ठान खर्च और सामग्री के पैमाने के लिहाज से इस साल के सबसे बड़े आयोजनों में शुमार हो गया है। संसाधनों के इस विशाल अर्पण ने एक बार फिर धार्मिक अनुष्ठानों की प्राचीन और खर्चीली परंपराओं को चर्चा में ला दिया है।

नर्मदा में बहाए गए दूध से कितने लोगों को होता फायदा?

एक ओर मां नर्मदा के जल को प्रदूषित करने का मामला तो दूसरी ओर दूध की बर्बादी पर सवाल, लेकिन इस श्रद्धा के पीछे की जो हकीकत है, वो रूह कंपा देने वाली है। मध्य प्रदेश में आज भी कुपोषण का दानव मासूमों को निगल रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। 1.36 लाख बच्चे ‘अति गंभीर’ श्रेणी में हैं, जिनकी जान पर हर वक्त खतरा मंडराता है। आधे से ज्यादा महिलाएं एनीमिया की शिकार है। वहीं अब दूध की इस बर्बादी का गणित समझेंगे तो अगर ये 11,000 लीटर दूध बर्बाद न होता, तो एक मानक गिलास 250ML के हिसाब से इससे 44,000 गिलास दूध तैयार होता। 44 हजार बच्चों का एक वक्त का पेट भरता, लेकिन इसे तो आस्था के नाम पर ये पोषण पानी में बहा दिया गया। क्या धर्म का अर्थ सिर्फ अनुष्ठान है? या धर्म का असली अर्थ नर-सेवा ही नारायण सेवा है? सीहोर के इस ‘महाअभिषेक’ ने एक ऐसी लकीर खींच दी है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं..श्रद्धा का प्रदर्शन या मानवता का संरक्षण?

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