नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) देश में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की संभावित किल्लत से त्वरित सेवा रेस्तरां (क्यूएसआर) शृंखलाओं का संचालन प्रभावित हो सकता है और उपभोक्ता क्षेत्र की कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स की एक रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी एलपीजी जरूरत का करीब 60 प्रतिशत आयात करता है और आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। लेकिन पश्चिम एशिया संकट के कारण इस मार्ग से आवागमन लगभग ठप हो जाने से गैस की किल्लत पैदा होने लगी है।
हालांकि, घरेलू एलपीजी उत्पादन में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है लेकिन अब भी इसकी आपूर्ति सीमित बनी हुई है। सरकार ने एलपीजी की उपलब्धता को घरेलू खाना पकाने और अस्पताल जैसे आवश्यक क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता दी है, जबकि रेस्तरां सहित गैर-जरूरी वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति सीमित कर दी गई है।
ऐसी स्थिति में पिज्जा हट, मैकडॉनल्ड्स और कैफे कॉफी डे जैसी क्यूएसआर कंपनियों के संचालन पर असर पड़ने की आशंका है। इसकी वजह यह है कि जुबिलेंट फूडवर्क्स, देवयानी इंटरनेशनल, सैफायर फूड्स इंडिया और वेस्टलाइफ फूडवर्ल्ड जैसी क्यूएसआर कंपनियां रसोई संचालन के लिए वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर पर बहुत निर्भर हैं।
ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक, रेस्तरां में एलपीजी सिलेंडर का भंडार आमतौर पर एक सप्ताह से भी कम का होता है। ऐसे में यदि वाणिज्यिक गैस सिलेंडर नहीं मिल पाता है तो इन कंपनियों के लिए सामान्य मांग पूरी करना कठिन हो सकता है और उनकी आय पर अस्थायी असर पड़ सकता है।
कुछ मीडिया रिपोर्टों में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता न होने की वजह से देश के कुछ हिस्सों में कुछ रेस्तरां के बंद होने की भी बात कही गई है।
इसी तरह, कांच की आपूर्ति बाधित होने से शराब कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। गैस की कमी का असर कांच विनिर्माण उद्योग पर भी पड़ रहा है। बोरोसिल लिमिटेड ने कहा है कि उसके विनिर्माण संयंत्रों में गैस आपूर्ति की कमी के कारण उत्पादन घटाना पड़ा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यदि कांच उत्पादन में व्यापक कमी आती है तो कांच की कीमतें बढ़ सकती हैं। शराब बनाने वाली कंपनियों के लिए कांच प्रमुख लागत घटक है और इसकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत तक होती है।
इसके अलावा, प्लास्टिक महंगा होने से रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान बनाने वाली (एफएमसीजी) कंपनियों पर भी असर पड़ने की आशंका है। सरकार ने रिफाइनरियों और पेट्रोरसायन परिसरों को प्रोपेन, ब्यूटेन और प्रोपिलीन जैसी गैसों को एलपीजी उत्पादन के लिए मोड़कर इसकी आपूर्ति बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
हालांकि, ऐसा होने से पेट्रोरसायन कच्चे माल की उपलब्धता कम हो सकती है, जिससे प्लास्टिक की कीमतें बढ़ने की आशंका है। इससे पैकेजिंग और उत्पादन में प्लास्टिक पर निर्भर एफएमसीजी और पेंट कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
एक अन्य रिपोर्ट में मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज ने कहा कि भारत का लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात पश्चिम एशिया के कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कुवैत जैसे देशों से आता है।
रिपोर्ट कहती है कि कच्चे तेल के उलट भारत के पास एलपीजी का रणनीतिक भंडार नहीं है। ऐसे में आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का असर बाजार में जल्दी दिखने लगता है।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
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