भारत की आर्थिक वृद्धि को कमतर आंकने की प्रवृत्ति पर पूर्व सीईए कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने उठाए सवाल

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भारत की आर्थिक वृद्धि को कमतर आंकने की प्रवृत्ति पर पूर्व सीईए कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने उठाए सवाल

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  • Publish Date - September 1, 2026 / 05:32 PM IST,
    Updated On - September 1, 2026 / 05:32 PM IST

नयी दिल्ली, एक सितंबर (भाषा) पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यन ने मंगलवार को देश की आर्थिक वृद्धि को कमतर आंकने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय आशावाद को ‘खुशामद’ नहीं कहा जा सकता है जबकि साक्ष्य के बगैर निराशावाद को बौद्धिक श्रेष्ठता नहीं समझा जाना चाहिए।

सुब्रमण्यन ने कुछ अर्थशास्त्रियों और वैश्विक संस्थानों पर भारत की आर्थिक वृद्धि को कमतर आंकने की प्रवृत्ति का आरोप भी लगाया।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब एक दिन पहले जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत की आर्थिक वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर 7.8 प्रतिशत रही है। यह रिजर्व बैंक के सात प्रतिशत वृद्धि अनुमान से भी अधिक है।

सुब्रमण्यन ने पीटीआई-भाषा के साथ बातचीत में कहा, ‘‘विश्वसनीय आशावाद किसी की खुशामद करना नहीं है। बिना सबूत के आशावाद महज कल्पनालोक में रहना है। लेकिन बिना सबूत के निराशावाद को बौद्धिक श्रेष्ठता नहीं समझा जाना चाहिए।’’

देश के जीडीपी अनुमानों को लेकर जारी व्यापक बहस के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में सुब्रमण्यन ने यह बात कही।

सुब्रमण्यन ने कहा कि कुछ वैश्विक संस्थानों और अर्थशास्त्रियों की ओर से भारत की आर्थिक वृद्धि के प्रदर्शन को बार-बार कम आंकने की प्रवृत्ति रही है।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वित्त वर्ष 2023-24 से 2026-27 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान लगातार वास्तविक वृद्धि से काफी नीचे रखे।

उन्होंने कहा, ‘पूर्वानुमान में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन एक ही दिशा में बार-बार होने वाली गलतियों से पूर्वानुमानों में इस्तेमाल धारणाओं और ढांचों की समीक्षा होनी चाहिए।’

सुब्रमण्यन ने पूर्व सीईए अरविंद सुब्रमण्यन के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि भारत की जीडीपी वृद्धि को हर साल करीब 2.7 प्रतिशत अंक बढ़ाकर बताया गया।

उन्होंने कहा कि यदि जीडीपी वृद्धि वास्तव में चार प्रतिशत होती और उसे बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत बताया जाता, तो लंबे समय में वास्तविक और घोषित जीडीपी के बीच अंतर बहुत बड़ा हो गया होता।

उन्होंने कहा, ‘‘निराशावाद आसान है। विश्वसनीय आशावाद के लिए जोखिम उठाना पड़ता है। भारत को न तो अंधे आशावाद की जरूरत है और न ही आत्मसंतोष की। लेकिन उसे पुरानी धारणाओं का बंधक भी नहीं बने रहना चाहिए।’’

इस बीच, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने अर्थव्यवस्था के नए आंकड़ों पर कहा, ‘इसके पहले वित्त वर्ष 2023-24 में 12.7 प्रतिशत, 2024-25 में 9.3 प्रतिशत और 2025-26 में 10.7 प्रतिशत की सालाना विनिर्माण वृद्धि रही है। क्या विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की शुरुआत हो चुकी है? अब ‘संकट की बात करने वालों’ की राय भी सुन लेते हैं।’

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने नवीनतम जीडीपी आंकड़ों को ‘सांख्यिकीय कलाबाजी’ करार देते हुए कहा कि सरकार पर आंकड़ों की पद्धति में बार-बार बदलाव कर आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर छिपाने का आरोप लगाया।

भाषा प्रेम प्रेम रमण

रमण