नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ ने शुक्रवार को कहा कि डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (डीपीआई) ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में 27 अरब डॉलर से अधिक की बचत करने के अलावा वित्तीय समावेश को भी रफ्तार दी है।
पिछले एक दशक में सीधे लाभार्थियों के खाते में ही सरकारी योजनाओं की राशि हस्तांतरित कर दी जाती है। इससे फर्जी खातों की समस्या दूर करने में मदद मिली है।
सेठ ने वित्तीय समावेश की दिशा में भारत की सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि डीपीआई की मदद से सात-आठ साल में ही 80 प्रतिशत आबादी के बैंक खाते खुल चुके हैं जबकि पहले यह अनुपात 20 प्रतिशत था। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में इस मुकाम तक पहुंचने में 47 साल लग जाते।
सेठ ने वित्तीय समावेश में डीपीआई की भूमिका पर आयोजित संगोष्ठी में कहा, ‘हमने देश के दूरदराज इलाके तक बेहतरीन सेवाएं देने के लिए समाधान-केंद्रित नजरिया अपनाया। हमारी उपलब्धियां आंकड़ों में भी नजर आती हैं। डिजिटल पहचान संख्या जारी होने के बाद वर्ष 2014 में जनधन योजना शुरू से अब तक 50 करोड़ से भी अधिक बैंक खाते खोले जा चुके हैं।’
उन्होंने कहा कि इनमें से 56 प्रतिशत बैंक खाते महिलाओं के हैं जबकि 67 प्रतिशत खाते ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्रों से संबंधित हैं। इन खातों में औसत राशि 4,000 रुपये से ज्यादा है। वहीं यूपीआई के जरिये लेनदेन का मासिक आंकड़ा अगस्त में 10 अरब से अधिक रहा।
आर्थिक मामलों के सचिव ने कहा कि भारत डीपीआई से संबंधित अपनी तकनीकी क्षमताओं को दूसरे देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है। इससे वैश्विक दक्षिण के देशों में वित्तीय समावेश की कोशिशों को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि डीपीआई उन नवाचारों की सुविधा प्रदान करता है जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों, विशेष रूप से उभरते देशों और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए प्रभावी हैं।
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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