नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) वैश्विक व्यापार के बदलते स्वरूप के बीच भारत को अपने मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की प्रभावशीलता का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। इसके साथ ही देश को अपने निवेश जांच प्रणाली को आधुनिक बनाने और अधिक समन्वित व्यापार तथा औद्योगिक नीति ढांचा अपनाने की जरूरत है। बृहस्पतिवार को जारी एक रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है।
‘रेजिलिएंस इन ए फ्रैगमेंटिंग वर्ल्ड: इंडिया’स इकोनॉमिक रिलेशंस विद ग्रेट पॉवर्स’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट कोआन एडवाइजरी ग्रुप ने चिंतन रिसर्च फाउंडेशन, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री काउंसिल और इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज के सहयोग से जारी की है।
रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की आर्थिक रणनीति को अब प्रतिक्रियात्मक नीति-निर्माण से आगे बढ़कर सक्रिय एकीकरण की दिशा में जाना चाहिए, जिसमें संतुलित साझेदारियां, मजबूत संस्थागत समन्वय और बाजार पहुंच के स्पष्ट लक्ष्य शामिल हों।
रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों में कहा गया कि भारत को मौजूदा एफटीए का ऑडिट कर यह आकलन करना चाहिए कि वे अपने निर्धारित उद्देश्यों को पूरा कर पाए हैं या नहीं तथा भविष्य के व्यापार समझौतों को औद्योगिक और निर्यात प्राथमिकताओं के साथ अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ा जाना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत को उच्च गुणवत्ता वाले बाजार समझौतों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और बहुपक्षीय संस्थानों तथा द्विपक्षीय निवेश संधियों का उपयोग कर व्यवसायों और निवेशकों के लिए अधिक स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए।
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा, ‘व्यापार समझौतों को अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं माना जा सकता। भारत को इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि प्रत्येक समझौता बाजार पहुंच, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और औद्योगिक क्षमता के मामले में क्या दे रहा है। अधिक अनिश्चित और संरक्षणवादी होती दुनिया में, यह मूल्यांकन करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हमारे एफटीए ने अपने उद्देश्यों को पूरा किया है।’
रिपोर्ट में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और विनिर्माण निर्भरता के बीच चीन के साथ आर्थिक जुड़ाव के विवादास्पद सवाल पर भी चर्चा की गई है।
इसमें कहा गया कि केवल भौगोलिक आधार पर प्रतिबंध लगाने के बजाय भारत को क्षेत्र-विशेष और राष्ट्रीय सुरक्षा आधारित निवेश जांच ढांचा अपनाना चाहिए तथा जिन क्षेत्रों में निर्भरता और संवेदनशीलता है, वहां चरणबद्ध तरीके से उसे कम करने की रणनीति अपनानी चाहिए।
रिपोर्ट में उन क्षेत्रों में चीनी कच्चे माल और कल-पुर्जों पर निर्भरता कम करने के लिए चरणबद्ध रणनीति बनाने की सिफारिश की गई है जहां जोखिम अधिक हैं।
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया कि विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वच्छ ऊर्जा और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाएं अभी भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी हुई हैं, जिनमें चीनी पूंजी और उपकरण शामिल हैं।
रिपोर्ट में गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी निवेश और प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की सिफारिश की गई।
कोआन एडवाइजरी ग्रुप के निदेशक दीप पाल ने कहा, ‘भारत के सामने विनिर्माण वृद्धि और प्रतिस्पर्धी क्षमता को बनाए रखने के साथ-साथ रणनीतिक कमजोरियों को कम करने की दोहरी चुनौती है। इसके लिए कड़े प्रतिबंधों से आगे बढ़कर एक अधिक नपे-तुले ढांचे की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, जो वैध राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक रूप से उत्पादक निवेश के बीच अंतर कर सके।’
भाषा योगेश रमण
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