नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने बुधवार को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन कर रही है और जल्द ही अपनी रफ्तार हासिल करते हुए चालू खाते में अधिशेष की स्थिति में लौट आएगी।
हालांकि, लाहिड़ी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौती देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी का कम होना है।
लाहिड़ी ने वित्तीय-प्रौद्योगिकी पर केंद्रित सम्मेलन ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ में कहा, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा है। मैं इसे बहुत अच्छा कभी नहीं कहूंगा, क्योंकि मैं एक सुधारवादी हूं।’’
देश की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में अपेक्षा से बेहतर 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।
उन्होंने कहा कि भारत जल्द ही चालू खाते में अधिशेष की स्थिति में पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि निवेश के लिए विदेशी पूंजी के साथ घरेलू बचत की भी महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘हम फिर से अपनी पुरानी स्थिति हासिल करेंगे और मुझे लगता है कि हम जल्द ही चालू खाते में अधिशेष दर्ज करेंगे… हम पहले तीन प्रतिशत के नियम को लेकर चिंतित रहते थे। यदि चालू खाते का घाटा जीडीपी के तीन प्रतिशत से अधिक हो जाता था, तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाती थी।’’
लाहिड़ी ने कहा कि भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) केवल पूंजी उपलब्ध कराने के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक मूल्य श्रृंखला तक पहुंच, विनिर्माण का पैमाना बढ़ाने और प्रौद्योगिकी हासिल करने में भी मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि भारत में जीडीपी के हालिया आंकड़ों में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन ‘हमें अब बहुत अधिक विनिर्माण की जरूरत है।’
लाहिड़ी ने कहा, ‘‘विकसित देशों में विनिर्माण की हिस्सेदारी घटी है, लेकिन ऐसा वहां प्रति व्यक्ति आय के काफी ऊंचे स्तर पर हुआ। भारत को विनिर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता विकसित करने की जरूरत है।’’
उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों का आना और निवेश सकारात्मक है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चालू खाते का घाटा 25.2 अरब डॉलर यानी जीडीपी का 0.6 प्रतिशत रहा था। वित्त वर्ष 2024-25 में भी यह 0.6 प्रतिशत यानी 22.9 अरब डॉलर था।
बैंकिंग क्षेत्र पर लाहिड़ी ने कहा कि ऋण आकलन को अधिक कुशल बनाया जा सकता है, ताकि जोखिम का बेहतर आकलन कर उसके अनुरूप ऋण की कीमत तय की जा सके।
उन्होंने कहा कि बैंकों को यूपीआई से पैदा होने वाले व्यापक आंकड़ों का इस्तेमाल ऋण आकलन और जोखिम का बेहतर मूल्य निर्धारण करने के लिए करना चाहिए। इससे अनौपचारिक क्षेत्र, खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को औपचारिक ऋण व्यवस्था में शामिल करने में भी मदद मिल सकती है।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
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