कंपनी के परिसमापन से टीडीएस जमा न करने की आपराधिक देनदारी खत्म नहीं होती: अदालत
कंपनी के परिसमापन से टीडीएस जमा न करने की आपराधिक देनदारी खत्म नहीं होती: अदालत
नयी दिल्ली, 24 अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि कंपनी के परिसमापन के बावजूद ‘स्रोत पर कर कटौती’ (टीडीएस) जमा नहीं करने के मामले में उसकी आपराधिक देनदारी खत्म नहीं होती और जिम्मेदार निदेशक भी आयकर कानून के तहत अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होता है।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम), मध्य दिल्ली की अदालत ने 19 अगस्त को 2009-10 के 17.68 करोड़ रुपये से अधिक के टीडीएस बकाया मामले में कंपनी मैसर्स नाफ्टोगाज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक को सजा सुनाई।
अदालत ने कंपनी पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जिसका भुगतान कंपनी की संपत्तियों या कोष से आधिकारिक परिसमापक द्वारा किया जाएगा। वहीं, निदेशक को एक साल 10 महीने के कठोर कारावास और 10 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
हालांकि, अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 430(3) के तहत दायर आवेदन पर सजा को 30 दिन के लिए निलंबित कर दिया और जमानत बॉन्ड भरने पर निदेशक को जमानत दे दी। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर, 2026 को होगी।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, यह मामला नौ जनवरी, 2012 को आयकर विभाग के टीडीएस दिल्ली प्रभार द्वारा नोएडा स्थित कंपनी के परिसर में किए गए सर्वेक्षण के बाद सामने आया। कंपनी ने वित्त वर्ष 2009-10 में 17.68 करोड़ रुपये से अधिक का टीडीएस काटा था, लेकिन निर्धारित समय के भीतर उसे सरकार के खाते में जमा नहीं किया था।
अदालत ने कहा कि निर्धारित अवधि में काटे गए टीडीएस को जमा नहीं करना अपराध बन जाता है। लेकिन बाद में कंपनी का परिसमापन होने से उसकी आपराधिक देनदारी खत्म नहीं होती और कंपनी के मामलों के लिए जिम्मेदार निदेशक आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 278बी के तहत अपनी देनदारी से मुक्त नहीं होता।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
अजय

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