नयी दिल्ली, 19 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि बैंक अधिकारियों का पद भरोसे का पद होता है क्योंकि वह सार्वजनिक धन से संबंधित कार्य करता है। अपनी शक्ति से परे ऋण स्वीकृत करना या ऋण के अंतिम उपयोग को सुनिश्चित न करना, वित्तीय अनियमितता के बराबर है जो बैंक को वित्तीय जोखिम में डालता है।
न्यायालय ने कहा कि ऋण वितरण के अंतिम उपयोग को सुनिश्चित करना कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। इसमें वसूली सुनिश्चित करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि ऋण को स्वीकृत या वितरित किए गए उद्देश्य के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि जब कोई बैंक कर्मचारी जमाकर्ताओं या ग्राहकों के धन का लेन-देन करता है, तो उसके लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सतर्क रहना और लापरवाही न करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वह अपने नियोक्ता के लिए और उसकी ओर से धन का लेन-देन करता है।
पीठ ने कहा कि हालांकि किसी भी संस्था के प्रत्येक कर्मचारी से अच्छे आचरण और अनुशासन की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब संस्था ग्राहकों या जमाकर्ताओं के धन का लेन-देन करती है तो इसकी आवश्यकता और भी अधिक होती है।
पीठ ने कहा, ‘‘ऐसे कर्मचारी या अधिकारी द्वारा कर्तव्यों के निर्वहन में कोई भी लापरवाही, चाहे वह लापरवाही/असावधानी से हो या जानबूझकर, गड़बड़ी है।’’
शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फरवरी, 2023 के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर अपना फैसला सुनाया, जो एक बैंक कर्मचारी से संबंधित मामले से जुड़ा है। कर्मचारी के खिलाफ कर्ज वितरण में अनियमितताओं के आरोप में 30 सितंबर, 2011 को आरोप पत्र दाखिल किया गया था।
पीठ ने पाया कि कर्मचारी 30 सितंबर, 2011 को सेवानिवृत्त हो गया था, लेकिन अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रही और ऋण के अंतिम उपयोग को सुनिश्चित करने में विफल रहने के आरोप को आंशिक रूप से सही पाया गया।
न्यायालय ने इस बात पर गौर किया कि परिणामस्वरूप, उसे स्थायी आधार पर वेतनमान में तीन ‘स्केल’ की कटौती का दंड दिया गया।
कर्मचारी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर तर्क दिया कि सेवानिवृत्त होने के कारण उस पर लगाया गया जुर्माना स्वीकार योग्य नहीं है।
उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने दंड आदेश को रद्द कर दिया, जबकि बैंक के पेंशन नियमों के तहत कार्रवाई के लिए नये सिरे से कारण बताओ नोटिस जारी करने का अधिकार सुरक्षित रखा।
बाद में, बैंक ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने माना कि मौजूदा सेवा नियमों के तहत सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करने के बाद भी अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति है और इसलिए, अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रह सकती है और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर, व्यक्ति ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
शीर्ष अदालत ने कहा ‘‘ बैंक अधिकारी का पद भरोसे का पद होता है क्योंकि वह सार्वजनिक धन से संबंधित कार्य करता है। अपनी शक्ति से परे ऋण स्वीकृत करना या ऋण के अंतिम उपयोग को सुनिश्चित न करना, वित्तीय अनियमितता के बराबर है जो बैंक को वित्तीय जोखिम में डालता है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, इस तरह के आरोप के साबित होने पर दंडात्मक कार्रवाई पर केवल इसलिए सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि बैंक को कोई नुकसान नहीं हुआ है।’’
जांच रिपोर्ट और अपीलकर्ता की टिप्पणियों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि उसे यह मानने का कोई आधार नहीं मिला कि आरोप आंशिक रूप से साबित नहीं हुआ था या लगाया गया जुर्माना साबित हुई गड़बड़ी की गंभीरता के अनुपात में ‘अत्यधिक असंगत’ था।
पीठ ने इस मुद्दे पर भी विचार किया कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद, अपीलकर्ता पर लगाया गया जुर्माना कानून के अनुसार स्वीकार्य योग्य था?
उच्चतम न्यायालय के पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि यदि मौजूदा सेवा नियम किसी कर्मचारी के सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करने से पहले उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देते हैं, तो उन्हें व्यक्ति की सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रखा जा सकता है और उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है।
पीठ ने कहा, ‘‘इस मामले में, दी गई सजा स्थायी आधार पर वेतनमान में तीन ‘स्केल’ की कमी है। वेतनमान में यह कमी उस तारीख से प्रभावी होगी जिस तारीख को संबंधित व्यक्ति सेवा से सेवानिवृत्त हुआ था।’’
न्यायालय ने कहा कि आम तौर पर पेंशन की गणना अंतिम प्राप्त/देय वेतन के आधार पर की जाती है।
पीठ ने अपील खारिज करते हुए कहा, ‘‘इसलिए, हमारी राय में, इस तरह के जुर्माने को लागू करना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि पेंशन की गणना उसी के अनुसार की जा सकती है।’’
भाषा रमण अजय
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