अल नीनो का 12 राज्यों में ‘गंभीर’ असर संभव, कृषि मंत्रालय ने जिलास्तर पर समन्वय के निर्देश दिए

अल नीनो का 12 राज्यों में 'गंभीर' असर संभव, कृषि मंत्रालय ने जिलास्तर पर समन्वय के निर्देश दिए

अल नीनो का 12 राज्यों में ‘गंभीर’ असर संभव, कृषि मंत्रालय ने जिलास्तर पर समन्वय के निर्देश दिए
Modified Date: June 16, 2026 / 07:41 pm IST
Published Date: June 16, 2026 7:41 pm IST

नयी दिल्ली, 16 जून (भाषा) कृषि मंत्रालय ने मंगलवार को प्रतिकूल मौसमी स्थिति ‘अल नीनो’ का देश के 12 राज्यों में खरीफ मौसम के दौरान अपेक्षाकृत ‘गंभीर’ असर पड़ने की आशंका जताई। इससे निपटने के लिए सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में जिला-स्तर पर समन्वित कार्रवाई के निर्देश दे दिए गए हैं।

अल नीनो से सबसे अधिक प्रभावित होने की आशंका वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र शामिल हैं।

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरीफ सत्र 2026 की तैयारियों की साप्ताहिक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा, ‘‘जिन नौ-दस राज्यों में अल नीनो का असर अधिक हो सकता है, वहां जिलाधिकारियों, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और अन्य विस्तार तंत्र के साथ समन्वित बैठकें आयोजित की जानी चाहिए।’’

उन्होंने बारिश की कमी वाले जिलों में अग्रिम वैकल्पिक योजना तैयार करने पर जोर देते हुए कपास और दलहन के रकबे को बढ़ाने की जरूरत भी बताई।

बैठक के बाद एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कुल 12 राज्यों के 326 जिलों की पहचान की गई है, जहां अल नीनो के कारण गंभीर असर पड़ सकता है। इन जिलों के लिए वैकल्पिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं।

अल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान बढ़ जाता है, जिससे भारत सहित कई क्षेत्रों में मानसून कमजोर पड़ सकता है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, वर्तमान में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) के दौरान इसके और मजबूत होने की आशंका है।

मौसम विभाग ने इस वर्ष लगभग 90 प्रतिशत बारिश का अनुमान जताया है, जो सामान्य से कम वर्षा का संकेत देता है।

कृषि मंत्रालय के बयान के अनुसार, चौहान ने राज्यों को संवेदनशील जिलों की स्पष्ट पहचान कर फसल के हिसाब से वैकल्पिक योजनाएं पहले से तैयार रखने को कहा, ताकि मौसम संबंधी चुनौतियों की स्थिति में किसानों को तुरंत विकल्प, सलाह और सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

चौहान ने कहा, “हर संवेदनशील जिले के लिए अलग और व्यावहारिक रणनीति तैयार की जानी चाहिए, जिसमें जल संरक्षण, नमी प्रबंधन, मिश्रित फसल और वैकल्पिक फसल के तरीके पर विशेष ध्यान दिया जाए।”

इसके साथ ही कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता किसानों तक ‘वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित शांत, विश्वसनीय और समाधान-उन्मुख संदेश’ पहुंचाने की है, न कि डर पैदा करने वाली सूचनाएं।

बैठक में अलग-अलग फसलों के लिए लक्ष्य, बुवाई की प्रगति और राज्यों की तैयारियों की समीक्षा की गई, जिसमें कपास उत्पादन बढ़ाने पर विशेष जोर रहा।

चौहान ने उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों, उपयुक्त बीज चयन, मिश्रित फसल, मल्चिंग (मिट्टी में नमी बनाए रखने की तकनीक) और नमी संरक्षण को बढ़ावा देने की बात कही।

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन भी इस बैठक में चर्चा का प्रमुख मुद्दा रहा। चौहान ने कहा कि सरकार राज्यों के साथ मिलकर अरहर, उड़द और मूंग की खेती को फसल चक्र, रकबा विस्तार, बेहतर बीज उपलब्धता और तकनीकी मार्गदर्शन के जरिये बढ़ा रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके।

समीक्षा बैठक में उर्वरकों की उपलब्धता, बाजार कीमतों, जलाशयों के स्तर और पानी के भंडारण की स्थिति का भी आकलन किया गया।

कृषि मंत्री ने आश्वस्त किया कि राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति पर्याप्त है और मानसून की प्रगति के साथ राज्यों एवं जिलों तक इसे और सुचारू बनाया जाएगा। स्थानीय किल्लत की आशंका वाले क्षेत्रों में उर्वरक की अग्रिम आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

चौहान ने कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों, केवीके और राज्य कृषि विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह समय पर खेतों तक पहुंचे।

उन्होंने खरीफ सत्र 2026 को सफल और सुरक्षित बनाने के लिए निरंतर संवाद, नियमित समीक्षा और जमीनी स्तर से सुझाव लेने पर भी जोर दिया।

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

अजय


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