नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) भारत में कृत्रिम मेधा (एआई) क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौती बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों का बाजार पर दबदबा या भेदभावपूर्ण व्यवहार न होकर कुशल प्रतिभाओं और आंकड़ों के मानकीकरण की कमी हैं। बुधवार को एक रिपोर्ट में यह बात कही गई।
नीतिगत शोध संस्थान ‘द डायलॉग’ की भारतीय एआई परिदृश्य पर जारी रिपोर्ट कहती है कि भारत का एआई क्षेत्र तेजी से विकास और विस्तार के दौर में है, लेकिन प्रतिभाओं की कमी और आंकड़ों के इस्तेमाल से जुड़ी बाधाएं इसके विकास को प्रभावित कर रही हैं।
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए कुल 308 स्टार्टअप कंपनियों, कारोबारी उपयोगकर्ताओं और उपभोक्ताओं के बीच सर्वेक्षण किया गया। इसमें 47.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कुशल प्रतिभाओं की उपलब्धता को प्रतिस्पर्धा के लिए बड़ी बाधा बताया। ग्राहक स्तर पर एआई को अपनाना भी इतनी ही बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया।
‘द डायलॉग’ की वरिष्ठ कार्यक्रम प्रबंधक भूमिका अग्रवाल ने कहा, ‘‘एआई की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के लिए प्रतिभाओं की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण बाधा बन रही है। एआई प्रणालियों को विकसित करने, प्रशिक्षित करने, लागू करने और बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने के लिए विशेष कौशल की जरूरत होती है।’’
रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 63.2 प्रतिशत एआई डेवलपर ने आंकड़ों के मानकीकरण की कमी को सबसे बड़ी चुनौती बताया है। यह कॉपीराइट से जुड़ी चिंता (44 प्रतिशत) और आंकड़ों की कमी (42 प्रतिशत) से कहीं अधिक है।
सरकारी आंकड़ों तक पहुंच भी काफी सीमित है। केवल 15 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि सरकार के पास उपलब्ध आंकड़े आसानी से सुलभ हैं।
रिपोर्ट में भारत के एआई क्षेत्र में ओपन-सोर्स मॉडल और उपकरणों पर भारी निर्भरता भी सामने आई। एआई स्टार्टअप और डेवलपर में से 96.2 प्रतिशत ने किसी न किसी रूप में ओपन-सोर्स मॉडल या उपकरणों के इस्तेमाल की बात कही, जबकि 62.3 प्रतिशत ने इस पर अपनी निर्भरता को ‘उच्च’ स्तर पर बताया।
रिपोर्ट के मुताबिक, एआई क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए केवल बड़ी कंपनियों के बाजार व्यवहार पर ध्यान देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रतिभाओं और उपयोगी एवं मानकीकृत आंकड़ों की उपलब्धता बढ़ाना भी जरूरी है।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
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