नयी दिल्ली, 11 जुलाई (भाषा) आर्थिक शोध संस्था जीटीआरआई ने शनिवार को कहा कि भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (सीईटीए) से बाजार तक पहुंच मिल जाएगी, लेकिन इससे निर्यात अपने-आप नहीं बढ़ेगा। इसके लिए भारत को मानकों, प्रमाणन, लॉजिस्टिक और खरीदार नेटवर्क को मजबूत करना होगा।
भारत एवं ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) 15 जुलाई से लागू होने जा रहा है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने एक रिपोर्ट में कहा, “मानकों, प्रमाणन, लॉजिस्टिक, नियामकीय मंजूरी और खरीदार नेटवर्क पर साथ-साथ काम न करने की स्थिति में निर्यात अवसर कागज पर ही रह जाएगा। यह समझौता दरवाजा खोलता है, लेकिन उसे निर्यात में बदलना भारत को ही होगा।”
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने उदाहरण देते हुए कहा कि खाद्य निर्यातकों को बेहतर परीक्षण, उत्पाद की पूरी निगरानी और ब्रिटेन के स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता मानकों का पालन करना होगा। वहीं मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को प्रमाणन, प्रौद्योगिकी एवं मजबूत खरीदार संबंधों की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि वाहन निर्यातकों को ‘मूलस्थान के नियम’ और तकनीकी मानकों पर खरा उतरना होगा, जबकि वस्त्र, चमड़ा और फुटवियर क्षेत्र को शुल्क में मिलने वाली राहत का लाभ उठाने के लिए तेजी से ऑर्डर हासिल करने होंगे।
जीटीआरआई के मुताबिक, इस व्यापार समझौते का सर्वाधिक लाभ उन क्षेत्रों में मिलने की संभावना है जहां भारत की निर्यात क्षमता मजबूत है, ब्रिटेन में मांग अधिक है और सीईटीए से शुल्क में स्पष्ट लाभ मिलता है। इनमें वस्त्र, परिधान, चमड़ा, फुटवियर, प्रसंस्कृत खाद्य, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद शामिल हैं।
विश्लेषण रिपोर्ट कहती है कि श्रम-प्रधान वस्तुओं, प्रसंस्कृत खाद्य, समुद्री उत्पाद, वाहन और कुछ विनिर्माण क्षेत्रों में बेहतर संभावनाएं हैं, जबकि इस्पात, पेट्रोलियम एवं शराब क्षेत्र में लाभ सीमित रहने की आशंका है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में ब्रिटेन ने दुनिया से 928.9 अरब डॉलर का आयात किया था जिसमें भारत की हिस्सेदारी केवल 15.2 अरब डॉलर यानी 1.6 प्रतिशत रही। वहीं भारत के कुल निर्यात में ब्रिटेन की हिस्सेदारी 3.4 प्रतिशत थी।
जीटीआरआई ने कहा कि कम बाजार हिस्सेदारी अपने आप में बड़े अवसर का संकेत नहीं है। निर्यात क्षमता का आकलन ब्रिटेन की मांग, भारत की आपूर्ति क्षमता, मौजूदा बाजार उपस्थिति और शुल्क लाभ जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
आर्थिक शोध संस्था ने कहा कि प्रसंस्कृत खाद्य, तैयार भोजन, बेकरी और पारंपरिक खाद्य उत्पादों में अवसर मजबूत हैं, लेकिन खाद्य सुरक्षा, लेबलिंग और उत्पाद की पूरी निगरानी अहम रहेगी।
वाहन क्षेत्र में भी शुल्क कटौती मददगार हो सकती है, लेकिन तकनीकी मानक निर्णायक होंगे। रसायन और औषधि क्षेत्र में भारत की क्षमता मजबूत होने के बावजूद नियामकीय एवं गुणवत्ता मानकों के कारण लाभ सीमित रह सकता है।
जीटीआरआई ने कहा कि इस्पात क्षेत्र यह दर्शाता है कि व्यापार समझौता बाजार पहुंच की गारंटी नहीं देता, क्योंकि ब्रिटेन के कड़े सुरक्षा उपाय और उच्च शुल्क लाभ को कम कर सकते हैं। वहीं शराब क्षेत्र में समस्या सीमित ब्रांड मौजूदगी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की है।
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