नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) टाटा समूह की प्रमुख कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध किए जाने की योजना और चेयरमैन एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने से जुड़े घटनाक्रम से कंपनी के प्रमुख शेयरधारकों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
टाटा संस में सर्वाधिक हिस्सेदारी रखने वाला टाटा ट्रस्ट जहां कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध किए जाने के खिलाफ है, वहीं दूसरे सबसे बड़े शेयरधारक शापूरजी पालोनजी समूह ने इसका समर्थन किया है। टाटा संस का निदेशक मंडल सूचीबद्धता की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला कर चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए टाटा संस के स्वामित्व ढांचे और प्रमुख शेयरधारकों के रुख को देखना जरूरी है। टाटा ट्रस्ट के पास करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शापूरजी पालोनजी समूह के पास 18.38 प्रतिशत और टाटा समूह की कंपनियों के पास 12.86 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शेष 2.87 प्रतिशत हिस्सेदारी सात व्यक्तियों और अन्य शेयरधारकों के पास है।
हालांकि टाटा ट्रस्ट की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी किसी एक इकाई के पास नहीं है। इसमें सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की 27.98 प्रतिशत और सर रतन टाटा ट्रस्ट की 23.56 प्रतिशत हिस्सेदारी है। अन्य ट्रस्टों में जेआरडी टाटा ट्रस्ट, टाटा एजुकेशन ट्रस्ट, टाटा सोशल वेलफेयर ट्रस्ट, एमके टाटा ट्रस्ट और सार्वजनिक सेवा ट्रस्ट शामिल हैं।
सूचीबद्धता के मुद्दे पर टाटा ट्रस्ट और शापूरजी पालोनजी (एसपी) समूह का रुख अलग-अलग है। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल एन टाटा सूचीबद्धता के खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि इससे टाटा संस की मौजूदा संरचना और टाटा मॉडल का मौलिक स्वरूप प्रभावित हो सकता है।
ट्रस्ट का कहना है कि मार्च, 2024 में रतन टाटा के मार्गदर्शन में टाटा संस के निदेशक मंडल ने कंपनी को गैर-सूचीबद्ध बनाए रखने पर सर्वसम्मति से फैसला किया था। जुलाई, 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी इस रुख की पुष्टि की थी।
इसके विपरीत, एसपी समूह के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने सूचीबद्धता का समर्थन किया है। उनका कहना है कि इससे टाटा संस में पारदर्शिता एवं सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ेगी तथा निवेशकों को कंपनी के मूल्य में भागीदारी का अवसर मिलेगा। उन्होंने सूचीबद्धता को ‘महज वित्तीय या नियामकीय मामला नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जरूरत’ बताया है।
टाटा संस के निदेशक मंडल ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा कंपनी का प्रंमुख निवेश कंपनी के रूप में पंजीकरण स्वेच्छा से वापस लेने का अनुरोध खारिज किए जाने के बाद सूचीबद्धता की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है। आरबीआई के पिछले हफ्ते आए फैसले के बाद टाटा संस पर ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के लिए नियामकीय व्यवस्था लागू है, जिसमें सूचीबद्धता की शर्त भी शामिल है।
टाटा संस में चंद्रशेखरन के कार्यकाल का मुद्दा भी इसी व्यापक विवाद का हिस्सा बन गया है। निदेशक मंडल ने उन्हें पांच साल का एक और कार्यकाल देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। लेकिन नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया और इसे अवैध बताया।
चंद्रशेखरन ने इससे पहले फरवरी में पद छोड़ने की योजना की घोषणा की थी और अगस्त में कहा था कि कार्यकाल विस्तार के लिए निदेशक मंडल का सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिलना उनके फैसले का एक कारण था। हालांकि, बृहस्पतिवार को उन्होंने एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन बने रहने का निदेशक मंडल का आग्रह स्वीकार कर लिया।
टाटा संस के छह-सदस्यीय निदेशक मंडल में चंद्रशेखरन, नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, सौरभ अग्रवाल, हरीश मनवानी और अनीता मरंगोली जॉर्ज शामिल हैं।
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