Vishnu Ka Sushasan: ‘गन’तंत्र पर गणतंत्र की विजय! साय सरकार के प्रयासों से बस्तर में बदलाव की बयार, अंदरूनी इलाकों में पहुंच रहा विकास

'गन'तंत्र पर गणतंत्र की विजय! साय सरकार के प्रयासों से बस्तर में बदलाव की बयार, Government Efforts to End Naxalism in Bastar

Vishnu Ka Sushasan: ‘गन’तंत्र पर गणतंत्र की विजय! साय सरकार के प्रयासों से बस्तर में बदलाव की बयार, अंदरूनी इलाकों में पहुंच रहा विकास
Modified Date: January 27, 2026 / 12:46 am IST
Published Date: January 26, 2026 8:43 pm IST

रायपुरः End Naxalism in Bastar कभी नक्सल हिंसा, डर और पिछड़ेपन की पहचान रहे बस्तर में अब बदलाव की नई बयार बह रही है। वर्षों तक बंदूक और बारूद के साए में जीने वाला यह अंचल अब विकास, विश्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार द्वारा अपनाई गई स्पष्ट नीति, संतुलित सुरक्षा रणनीति और विकास-केंद्रित दृष्टिकोण का परिणाम है। साय सरकार ने बस्तर में केवल सैन्य कार्रवाई तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि “सुरक्षा, संवाद और विकास” के मॉडल पर काम किया।

छत्तीसगढ़ की सत्ता में साय सरकार के आने से पहले बस्तर में नक्सलवाद चरम पर था। नक्सली संगठन गांवों में समानांतर शासन चलाते थे। जन अदालतें, जबरन वसूली, मुखबिरी के शक में हत्याएं और गांव छोड़ने की धमकियां आम बात थीं। स्कूलों को बंद करा दिया जाता था, सड़क निर्माण जैसे विकास कार्यों का विरोध होता था और मोबाइल टावर तक फूंक दिए जाते थे ताकि शासन की पहुंच न बन सके। छत्तीसगढ़ की सत्ता संभालते ही साय ने नक्सलवाद के खात्मे और बस्तर के विकास के लिए विशेष रणनीति बनाई और केंद्र सरकार के समन्वय के साथ काम किया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार ने बस्तर के लिए केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि समग्र विकास का स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है।

टूटी नक्सलवाद की कमर

End Naxalism in Bastar नक्सलवाद के खात्मे के लिए केंद्र सरकार के समन्वय के साथ साय सरकार काम कर रही है। केंद्र सरकार ने 31 मार्च तक देश से नक्सलवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया है। फोर्स की तगड़ी घेराबंदी के चलते 90 फीसदी से ज्यादा नक्सली सरेंडर, गिरफ्तार और मारे जा चुके है। स वर्ष अब तक राज्य में 189 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। गत 19 जनवरी को, 45 लाख रुपये के कुल इनाम वाले नौ नक्सलियों ने पड़ोसी गरियाबंद जिले में आत्मसमर्पण किया था। वहीं, 15 जनवरी को, राज्य के बस्तर क्षेत्र में स्थित बीजापुर जिले में कम से कम 52 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया जिनमें से 49 पर 1.41 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम था। वर्ष 2025 में राज्य में 1,500 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था।

नियद नेल्लानार योजना बनी विकास की संजीवनी

सुशासन को मूलमंत्र मानने वाली सरकार ने सबसे पहले सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाई। वहीं दूसरी ओर साय सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के लिए कई योजना बनाई। इनमें ‘नियद नेल्लानार’ योजना प्रमुख रूप से शामिल है। सरकार बनने के महज 2 महीने के बाद 15 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इस नियद नेल्लानार योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत स्थानीय लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं और इन सुरक्षा कैंपों की पांच किमी की परिधि में आने वाले गांवों में सरकार की कल्याणकारी एवं विकास योकजनाओं के अंतर्गत मूलभूत संसाधन उपलब्ध कराए गए। आवास, पानी बिजली, सड़क, स्कूल आदि सेवाएं उपलब्ध कराई गई। नियद नेल्लानार का मतलब है “आपका अच्छा गांव” या “योर गुड विलेज”। नियद नेल्लानार स्थानीय दंडामी बोली दक्षिण बस्तर में बोली जाने वाली है। योजना का मुख्य फोकस इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के विकास पर है. इसका क्रियान्वयन विशेष रूप से वनांचल क्षेत्रों में किया जा रहा है, जहां विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। इसी का परिणाम रहा कि बस्तर के कई गावों में विकास की नई दिशा देखने को मिली।

स्कूलों में बजी घंटी, महिलाएं हो रही सशक्त

बस्तर अंचल में नक्सलवाद का सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है। दशकों तक चली हिंसा और अस्थिरता ने न केवल स्कूलों की इमारतों को नुकसान पहुंचाया, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी अंधेरे में धकेल दिया। सत्ता परिवर्तन के बाद साय के प्रयासों से आज स्कूलों में बच्चों की खिलखिलाहट गूँज रही है। दो वर्षों में लगभग 300 से अधिक बंद स्कूलों को फिर से खोला गया है। प्रशासन ने न केवल भवन बनाए, बल्कि शिक्षकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की है। दुर्गम पहाड़ियों में रहने वाले बच्चों के लिए पोटा केबिन (पोर्टेबल केबिन स्कूल) शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरे हैं। वहीं साय सरकार के प्रयासों अब वहां की महिलाएं सशक्त हो रही है। एक ओर जहां उन्हें महतारी वंदन योजना का लाभ मिल रहा है तो दूसरी ओर दंतेवाड़ा में शुरू की गई गारमेंट फैक्ट्रियों ने हजारों आदिवासी महिलाओं की जिंदगी बदल दी है। उनके द्वारा सिले गए कपड़े अब बड़े शहरों के मॉल्स और विदेशों तक पहुँच रहे हैं। इसके अलावा बस्तर की महिलाएं कई ऐसे प्रतिमान गढ़ रही है, जो मैदानी इलाकों की महिलाओं से उदाहरण है।

प्राकृतिक सुंदरता को नई पहचान, युवाओं को मिला रोजगार

नक्सलवाद के खात्मे के साथ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अगुवाई वाली सरकार ने बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता, आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को पर्यटन के माध्यम से नई पहचान देने का प्रयास किया। चित्रकोट, तीरथगढ़, कांगेर घाटी जैसे पर्यटन स्थलों के विकास पर जोर दिया साय सरकार के प्रयासों से नक्सलवाद के खात्मे के साथ पर्यटन बस्तर की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है। डर का पर्दा हटते ही दुनिया को बस्तर की असली सुंदरता दिखने लगी है। बस्तर जिले के छोटे से गांव धुड़मारास ने देश और दुनिया में अपनी अनोखी पहचान बनाई है। बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित धुड़मारास गांव को संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन द्वारा सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव के उन्नयन कार्यक्रम के लिए चयनित किया गया है। पर्यटन के बढ़ते अवसरों ने बस्तर के स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खोले। होमस्टे, गाइड सेवा, हस्तशिल्प, लोक कला और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिला। इससे न केवल आर्थिक स्थिति सुधरी, बल्कि युवाओं को अपने क्षेत्र में ही भविष्य देखने का अवसर मिला।

खेल और संस्कृति से बदलता बस्तर

बस्तर लंबे समय तक नक्सलवाद, पिछड़ेपन और उपेक्षा की पहचान के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन आज वही बस्तर बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। इस परिवर्तन की सबसे सशक्त मिसाल हैं बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम। ये दोनों आयोजन न केवल खेल और संस्कृति का उत्सव हैं, बल्कि बस्तर के आत्मविश्वास, अस्मिता और शांतिपूर्ण भविष्य का प्रतीक भी बन चुके हैं। बस्तर ओलंपिक का उद्देश्य केवल खेल प्रतियोगिता कराना नहीं, बल्कि बस्तर के युवाओं को सकारात्मक दिशा देना है। गांव-गांव से निकले युवा खिलाड़ी पहली बार बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। पारंपरिक खेलों से लेकर आधुनिक खेलों तक, बस्तर ओलंपिक ने खेल को जोड़ने का माध्यम बना दिया है। बस्तर पंडुम बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और लोककलाओं का उत्सव है। यहां नृत्य, गीत, वाद्य यंत्र, वेशभूषा और रीति-रिवाज पूरे वैभव के साथ सामने आते हैं। यह आयोजन आदिवासी समाज की अस्मिता और स्वाभिमान को मजबूत करता है। बस्तर पंडुम ने यह साबित किया है कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं, बल्कि उन्हें सहेजते हुए आगे बढ़ना है। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम ने पर्यटन को भी नई गति दी है। देश-विदेश से लोग बस्तर की संस्कृति और प्रतिभा को देखने आ रहे हैं। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार, हस्तशिल्प को बाजार और बस्तर को नई पहचान मिल रही है।

राष्ट्रीय पर चमकी बस्तर की प्रतिभाएं

बस्तर संभाग को लंबे समय तक नक्सलवाद और पिछड़ेपन के नजरिए से देखा जाता रहा, लेकिन इसी धरती ने देश को ऐसे व्यक्तित्व भी दिए हैं, जिन्होंने अपनी कला, संस्कृति, समाजसेवा और लोकपरंपराओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। नारायणपुर जिले के जनजातीय कलाकार पंडी राम मंडावी, नारायणपुर जिले के छोटे डोंगर के जाने-माने वैद्यराज हेमचंद मांझी, कांकेर जिले में काष्ठ कला से जेल में बंद 400 से अधिक नक्सल बंदियों का जीवन संवारने वाले अजय मंडावी को पद्मश्री मिला है। वर्ष 2026 में भी दंतेवाड़ा की समाजसेविका बुधरी ताती तथा चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में दशकों से निस्वार्थ कार्य कर रहे डॉ. रामचंद्र त्रयम्बक गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले को पद्मश्री पुरस्कार से अलंकृत किया जाएगा। डॉ. गोडबोले दंपत्ति को यह सम्मान संयुक्त रूप से प्रदान किया जाएगा। बस्तर संभाग से पद्मश्री सम्मान पाने वाले कलाकार केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे पूरे आदिवासी अंचल की संस्कृति, संघर्ष और सृजनशीलता के प्रतिनिधि हैं। इन सम्मानों ने बस्तर को देश के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक नई पहचान दी है।

लोकतंत्र और गणतंत्र की जीत

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के 41 गांवों में पहली बार तिरंगा झंडा फहराया गया। यह गांव वर्षों से नक्सली हिंसा का शिकार रहे हैं। बीजापुर, नारायणपुर, और सुकमा के इन गांवों में तिरंगा झंडा आन बान और शान के साथ लहराया। इनमें बीजापुर के 13 गांव, नारायणपुर के 18 गांव और सुकमा के 10 गांव शामिल है। यह कदम ‘लाल आतंक’ के अंत की लड़ाई में मिली सफलता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है और शांति एवं विकास का संकेत देता है। ये गांव दशकों से ऐसे राष्ट्रीय समारोहों से दूर रहे थे, लेकिन अब देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक भावना में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।

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लेखक के बारे में

सवाल आपका है.. पत्रकारिता के माध्यम से जनसरोकारों और आप से जुड़े मुद्दों को सीधे सरकार के संज्ञान में लाना मेरा ध्येय है। विभिन्न मीडिया संस्थानों में 10 साल का अनुभव मुझे इस काम के लिए और प्रेरित करता है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रानिक मीडिया और भाषा विज्ञान में ली हुई स्नातकोत्तर की दोनों डिग्रियां अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए गति देती है।