शह मात The Big Debate: नक्सलियों के साथ.. किसका हाथ? भूमकाल दिवस में हिड़मा के समर्थन में बजा गाना, आखिर कौन छीन रहा आदिवासियों का जल-जमीन और जंगल?

नक्सलियों के साथ.. किसका हाथ? भूमकाल दिवस में हिडमा के समर्थन में बजा गाना, Hidma Supporting Song in Chhattisgarh

शह मात The Big Debate: नक्सलियों के साथ.. किसका हाथ? भूमकाल दिवस में हिड़मा के समर्थन में बजा गाना, आखिर कौन छीन रहा आदिवासियों का जल-जमीन और जंगल?

CG Politics

Modified Date: February 13, 2026 / 12:23 am IST
Published Date: February 12, 2026 11:36 pm IST

रायपुरः CG Politics देश-प्रदेश और बस्तर से नक्सलवाद के सफाए के लिए जवानों के लगातार संघर्ष के बाद ये साफ-साफ दिखने लगा है कि अब नक्सली पूरी तरह से बैकफुट पर हैं। इसी बीच भूमकाल दिवस पर एक रैली से सामने आई कुछ तस्वीरों से सवाल उठा कि क्या बस्तर में अब भी नक्सलियों के समर्थक मौजूद हैं? क्या कोई अब भी पुलिस-प्रशासन-सरकार से ज्यादा नक्सली लीडर के फिक्र करता है? तस्वीर पर विपक्ष ने फौरन सरकार को घेरना शुरू किया तो बीजेपी ने इसे कांग्रेस की फितरत बताकर सवाल उठाया। सवाल ये कि अब तो आयोजनकर्ता खुद घटना पर यू-टर्न ले चुके हैं, तो विपक्ष की आपत्ति का क्या?

पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का मानना है कि जो भी जल-जंगल-जमीन का संरक्षण करेगा, उसे लोगों का समर्थन मिलेगा और जो जल, जंगल, जमीन की लूटेगा उसे विरोध झेलना होगा, फिर चाहे वो संगठन हो, सरकार हो या कंपनी। भगत के बयान पर मंत्री केदार कश्यप ने पलटवार में कहा कि झीरम पर घड़ियाली आँसू बहाने वाली कांग्रेस का असल चेहरा यही है। वो हमेशा नक्सलियों के साथ रही है। बीजेपी के आरोप का कांग्रेस ने खंडन किया है।

18 नवंबर को हुआ था ढेर

CG Politics दरअसल, बीते दिन बस्तर में भूमकाल दिवस पर निकाली गई रैली में पुलिस-प्रशासन के सामने नक्सली कमांडर हिड़मा के समर्थन में गाना बजाया गया। वही हिड़मा जिसे हमारे सुरक्षाबलों ने आंध्रप्रदेश में 18 नवंबर को ढेर किया था। जिस रैली की सुरक्षा जवान कर रहे थे, उसी रैली में डीजे पर बज रहे गाने में हिडमा के गुणगान के साथ-साथ सरकार और जवानों की आलोचना थी। और तो और आदिवासियों की रैली में जय-भीम लिखे झंडे लहराते रहे। विवाद गर्माने पर सर्व आदिवासी समाज ने सफाई में कहा कि फ्लो-फ्लो में ऐसा हो गया। किसी भी माओवादी नेता को महिमामंडित करने की ना तो मंशा थी ना कोई प्लानिंग। सवाल ये है कि जब नक्सलियों के पूर्ण सफाए के लिए जांबाज जवान दिन-रात एक किए हैं। देश मार्च 31 का इंतजार कर रहा है और खुद सर्व समाज कहता है कि वो सरकार के साथ हैं। नक्सली समर्थन गाना बजना चूक थी तो क्या कांग्रेसी नेता इसे जल-जंगल-जमीन के आदिवासी हक से जोड़कर सियासी जुगाड़ बिठा रहे हैं?

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लेखक के बारे में

सवाल आपका है.. पत्रकारिता के माध्यम से जनसरोकारों और आप से जुड़े मुद्दों को सीधे सरकार के संज्ञान में लाना मेरा ध्येय है। विभिन्न मीडिया संस्थानों में 10 साल का अनुभव मुझे इस काम के लिए और प्रेरित करता है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रानिक मीडिया और भाषा विज्ञान में ली हुई स्नातकोत्तर की दोनों डिग्रियां अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए गति देती है।